ग्लोबल 'ट्राइबलिज्म' और नए खतरे
उदय कोटक का मानना है कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमिक माहौल पहले जैसा नहीं रहा, बल्कि यह 'ट्राइबलिज्म' (Tribalism) की ओर लौट रहा है। उनका कहना है कि दुनिया भर के देश अब अहम संसाधनों और व्यापार मार्गों पर नियंत्रण के लिए आपस में भिड़ रहे हैं। इस बदलाव के कारण भारतीय कंपनियों और नीति निर्माताओं को जोखिमों से निपटने के अपने तरीके को पूरी तरह से बदलना होगा और सामान्य रणनीतियों से हटकर अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी।
तेल की कीमतें, करेंसी और ट्रेड डेफिसिट का बढ़ता खतरा
कोटक ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में जारी संघर्षों का बड़ा आर्थिक प्रभाव पड़ना तय है, जब तक कि यह तुरंत समाप्त न हो जाए। भारत कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील है। अगर कच्चा तेल, जो 12 मई 2026 को लगभग $106.83 प्रति बैरल पर था, $100 प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) काफी बढ़ सकता है। अनुमानों के अनुसार, यह -1% से घटकर -2.5% GDP तक पहुंच सकता है। आयात लागत बढ़ने का सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ेगा। 12 मई 2026 को 95.60 के आसपास ट्रेड कर रहा रुपया, तेल की कीमतें ऊंची रहने पर और गिरकर 94-95 या इससे ऊपर जा सकता है। इन बढ़ी हुई लागतों का बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, क्योंकि ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) अभी बड़े नुकसान झेल रही हैं। इससे महंगाई का खतरा भी बढ़ेगा, क्योंकि परिवहन लागत बढ़ने से खाने-पीने की चीजों और मैन्युफैक्चरिंग की कीमतें भी बढ़ेंगी।
सक्रिय जोखिम प्रबंधन और मजबूत तैयारी
कोटक का 'स्ट्रैटेजिक पैरानोइया' का आह्वान, ग्लोबल 'ट्राइबलिज्म' और अस्थिरता के जवाब में सक्रिय जोखिम प्रबंधन और आर्थिक पुनर्गठन की मांग करता है। जियोपॉलिटिकल अस्थिरता अब भारतीय व्यवसायों के लिए सबसे बड़ा भविष्य का जोखिम बन गई है। 2025 में, 80% से अधिक बड़ी भारतीय कंपनियों ने ग्लोबल अस्थिरता के कारण वित्तीय प्रभाव की सूचना दी थी, जिससे पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस की मांग में 30% की वृद्धि हुई। कंपनियाँ अपनी मुख्य रणनीतियों में जियोपॉलिटिकल जानकारी को शामिल कर रही हैं और सक्रिय सुरक्षा की ओर बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि इंडिया इंक. कम एकाग्रता (concentration) से विविधीकरण (diversification) की ओर और अल्पकालिक दक्षता (short-term efficiency) से दीर्घकालिक लचीलेपन (long-term resilience) की ओर बढ़े। इसमें बैलेंस शीट को मजबूत करना, मजबूत सप्लाई चेन बनाना, बाजारों का विविधीकरण करना और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में निवेश करना शामिल है। कंपनियों को अपने रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में जियोपॉलिटिकल जोखिम को शामिल करने, सबसे बुरे हालात के लिए स्ट्रेस टेस्ट करने और तिमाही जोखिम समीक्षाएं करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। लक्ष्य यह है कि रिस्क मैनेजमेंट को एक प्रतिस्पर्धी लाभ के रूप में इस्तेमाल किया जाए। कुछ कंपनियां सप्लाई चेन को डिजिटाइज कर रही हैं और ऑपरेशनल जोखिमों पर तेजी से प्रतिक्रिया करने के लिए 'जियोपॉलिटिकल कंट्रोल टावर्स' बना रही हैं।
लगातार बनी हुई चुनौतियां और कमजोरियां
लचीलापन बनाने के प्रयासों के बावजूद, भारतीय व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। देश अपनी लगभग 90% तेल की जरूरतें आयात करता है, जिससे यह ग्लोबल प्राइस शॉक और सप्लाई में बाधाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, खासकर हॉरमूज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्गों से। मूडीज रेटिंग्स (Moody's Ratings) ने हाल ही में 2026 और 2027 के लिए भारत की GDP ग्रोथ के अनुमान को 6% तक कम कर दिया है, जिसमें उच्च ऊर्जा लागत और कमजोर उपभोक्ता खर्च को मुख्य समस्या बताया गया है। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स (S&P Global Ratings) ने चेतावनी दी है कि उच्च तेल की कीमतें भारत की GDP ग्रोथ को 80 बेसिस पॉइंट तक धीमा कर सकती हैं और कॉर्पोरेट बैलेंस शीट पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं, जिससे EBITDA में 15-25% तक की कमी आ सकती है। छोटे और मध्यम आकार के उद्यम (SMEs) विशेष रूप से जोखिम में हैं। 2026 में अब तक ₹2 लाख करोड़ से अधिक का लगातार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) का बहिर्वाह, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता और करेंसी कमजोरी के कारण उभरते बाजार की संपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन दर्शाता है। गिरता हुआ भारतीय रुपया आयातित महंगाई को बढ़ावा दे रहा है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मौद्रिक नीति को जटिल बना रहा है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो USD/INR 95-97 के बीच रह सकता है।
बाजार का दृष्टिकोण और नीतिगत चुनौतियां
आगे देखते हुए, विश्लेषकों को तेल की कीमतें $90-$100 प्रति बैरल की रेंज में रहने की उम्मीद है, जिससे ऊर्जा-निर्भर क्षेत्रों के मार्जिन पर दबाव बना रहेगा। Nifty FY27 के लिए अर्निंग ग्रोथ की उम्मीदें ऊंची सिंगल डिजिट तक समायोजित की गई हैं, जो मौजूदा आर्थिक दबावों के बारे में चिंताओं को दर्शाती हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) एक मुश्किल दुविधा का सामना कर रहा है: महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना विकास को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि दरों को स्थिर रखने से महंगाई अनियंत्रित हो सकती है। वर्तमान बाजार की भावना तटस्थ से हल्की सकारात्मक है, लेकिन बाहरी झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। भारतीय इक्विटी बाजार का मूल्यांकन, Nifty 50 का P/E अनुपात लगभग 20.68 और सेंसेक्स का 20.560 है, जो ऐतिहासिक डेटा की तुलना में उचित रूप से मूल्यांकित (fairly valued) प्रतीत होता है, लेकिन कुछ उभरते बाजार के साथियों की तुलना में प्रीमियम हो सकता है। हालांकि, लगातार ग्लोबल झटके इन मूल्यांकनों को चुनौती दे सकते हैं।
