Kotak AMC चीफ की RBI से गुहार: ग्रोथ बढ़ाएं, पर महंगाई से कैसे निपटें?

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
Kotak AMC चीफ की RBI से गुहार: ग्रोथ बढ़ाएं, पर महंगाई से कैसे निपटें?
Overview

कोटक महिंद्रा एएमसी के एमडी निलेश शाह ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए एक्टिव पॉलिसी अपनाने की वकालत की है। उनका कहना है कि फाइनेंशियल सिस्टम में लिक्विडिटी बनाए रखना और बॉन्ड यील्ड को कंट्रोल में रखना फॉरेन कैपिटल को आकर्षित करेगा। हालांकि, ग्लोबल घटनाओं से बढ़ती महंगाई और कमजोर होते रुपए के कारण आरबीआई के सामने प्राइस स्टेबिलिटी और ग्रोथ के बीच तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती है।

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ग्रोथ की वकालत या महंगाई का डर: RBI के सामने दुविधा

कोटक महिंद्रा एएमसी के एमडी निलेश शाह ने आरबीआई को 'मेन हूँ ना' (चिंता मत करो, मैं हूं ना) जैसा एप्रोच अपनाने की सलाह दी है। शाह का मानना है कि फाइनेंशियल सिस्टम में अच्छी लिक्विडिटी बनाए रखना और बॉन्ड यील्ड को 7% से नीचे रखना फॉरेन इन्वेस्टर्स को आकर्षित करने में मदद करेगा। लेकिन, यह ग्रोथ बढ़ाने की वकालत ऐसे समय में आ रही है जब जियोपॉलिटिकल टेंशन और उनके कारण बढ़ती महंगाई भारतीय इकोनॉमी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।

ग्लोबल दबाव और ग्रोथ की जरूरत

शाह की यह मांग ऐसे नाजुक मोड़ पर आई है जब भारत की इकोनॉमी पर ग्लोबल दबाव बढ़ रहा है। मिडिल ईस्ट में चल रहे जियोपॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट्स के कारण ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। इससे भारत की इम्पोर्ट कॉस्ट बढ़ रही है और महंगाई को हवा मिल रही है। यह स्थिति भारतीय रुपए पर भी भारी दबाव डाल रही है, जो हाल ही में ₹93 प्रति यूएस डॉलर के पार चला गया था। ऐसे में आरबीआई के सामने एक कठिन फैसला है: इकोनॉमिक ग्रोथ को गति देना या कीमतों को स्थिर रखना। फिलहाल, बेंचमार्क 10-साल का बॉन्ड यील्ड करीब 7.05% पर है, लेकिन बढ़ती ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स के बीच इसे और नीचे रखना चुनौतीपूर्ण है।

आरबीआई की प्राथमिकता: महंगाई पर लगाम

संभावना है कि आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) अपनी अप्रैल 2026 की समीक्षा में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखेगी। उनका मुख्य फोकस ग्रोथ को तेज़ करने की बजाय महंगाई को कंट्रोल करना रहेगा। बढ़ती इम्पोर्ट कॉस्ट और करेंसी में उतार-चढ़ाव से अनिश्चित हुए इंफ्लेशन एक्सपेक्टेशंस को मैनेज करना आरबीआई के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। आरबीआई एक ऐसी दुविधा में फंसा है जहां ग्रोथ को बढ़ावा देने से महंगाई और बढ़ सकती है।

फॉरेन कैपिटल और रुपए पर दबाव

फॉरेन इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करना भारत के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) का पैसा निकालना जारी है, जिसका मार्केट सेंटीमेंट और लिक्विडिटी पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) का सपोर्ट होने के बावजूद, भारतीय रुपए की स्थिरता अभी भी ग्लोबल इकोनॉमिक प्रेशर, जैसे कि मजबूत यूएस डॉलर और हाई क्रूड ऑयल प्राइसेज से प्रभावित है। आरबीआई की ओर से किए गए एक्शन से फिलहाल कुछ राहत मिली है, लेकिन यह दिखाता है कि रुपया केवल मार्केट फोर्सेज पर नहीं, बल्कि सेंट्रल बैंक के सपोर्ट पर काफी हद तक निर्भर है।

महंगाई का जोखिम और ग्लोबल असर

भारत के इकोनॉमिक आउटलुक के लिए सबसे बड़ा खतरा लगातार बढ़ती महंगाई है। एनर्जी की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन की लागत बढ़ाती हैं, जिससे कई सेक्टर्स में कीमतें बढ़ रही हैं। यह इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन, कमजोर रुपए के साथ मिलकर, लोगों की परचेज़िंग पावर घटा रही है और आरबीआई के लिए महंगाई को मैनेज करना और मुश्किल बना रही है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव एनर्जी सप्लाई को और बाधित कर सकता है और कीमतों को और ऊपर ले जा सकता है। यदि यह टेंशन बढ़ती है, तो इसका इकोनॉमिक शॉक इमर्जिंग मार्केट्स जैसे भारत को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।

भविष्य की राह

जैसे-जैसे भारत अपना नया फिस्कल ईयर शुरू कर रहा है, देश का इकोनॉमिक पाथ काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि जियोपॉलिटिकल टेंशन कैसे सामने आते हैं और उनका कमोडिटी प्राइसेज और ग्लोबल ट्रेड पर क्या असर पड़ता है। एनालिस्ट्स एक सावधानी भरी उम्मीद का दौर देख रहे हैं। मार्केट्स आरबीआई की भविष्य की गाइडलाइंस पर बारीकी से नजर रखेंगे, जिसमें महंगाई पर फोकस बना रहेगा, साथ ही ग्रोथ की चुनौतियों का भी जिक्र होगा। सेंट्रल बैंक और पॉलिसीमेकर्स का इन जटिल फैक्टर्स को मैनेज करने का स्किल, अस्थिर ग्लोबल सीन में भारत की ग्रोथ को बनाए रखने में अहम होगा। किसी भी स्टिमुलस उपाय की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे सप्लाई इश्यूज और ग्लोबल प्राइस प्रेशर से कैसे निपट पाते हैं, बिना डोमेस्टिक इन्फ्लेशन को भड़काए।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.