फिस्कल गैप को पाटने की तैयारी
कर्नाटक सरकार एक अहम नई एक्साइज पॉलिसी ला रही है, जिसका मकसद शराब की खपत को रोकना और राज्य के बड़े फिस्कल इम्बैलेंस को ठीक करना है. राज्य को शराब से होने वाले सामाजिक नुकसान पर हर साल लगभग ₹51,000 करोड़ का खर्च आता है, जो मौजूदा एक्साइज रेवेन्यू यानी करीब ₹34,600 करोड़ से कहीं ज्यादा है. इस नई पॉलिसी की सबसे खास बात यह है कि यह भारत में पहली बार अल्कोहॉल बाय वॉल्यूम (ABV) यानी शराब में मौजूद अल्कोहॉल की मात्रा के आधार पर टैक्स लगाएगी.
शराब उत्पादकों पर असर
इस 'अल्कोहॉल-इन-बेवरेज' (AIB) मॉडल से मार्केट का री-प्राइसिंग (Repricing) होगा. ज्यादा ABV वाली शराब महंगी हो जाएगी, जबकि बीयर जैसी हल्की ड्रिंक्स की कीमतें थोड़ी कम हो सकती हैं. इससे ग्राहक प्रीमियम ऑप्शन्स की तरफ बढ़ सकते हैं, जो कि इंडिया के एल्को-बेव सेक्टर में एक ट्रेंड भी है. United Spirits, Radico Khaitan और United Breweries जैसी बड़ी लिस्टेड कंपनियां, जिनकी वैल्यूएशन (Valuation) काफी हाई है, उन्हें इस बदलाव से निपटना होगा.
जोखिम और रेगुलेटरी बाधाएं
हालांकि, इस पॉलिसी में कई रिस्क भी शामिल हैं. रेवेन्यू की सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) एक बड़ा सवाल है. अगर खपत वाकई घट जाती है या ग्राहक पड़ोसी राज्यों का रुख करते हैं, तो कर्नाटक के रेवेन्यू टारगेट पूरे नहीं हो पाएंगे. महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहले एक्साइज बढ़ाने से डिस्टिलर्स के स्टॉक प्राइस गिरे हैं, जो मार्केट की इस सेंसिटिविटी (Sensitivity) को दिखाता है. सस्ती शराब के महंगे होने से लोग अवैध शराब की तरफ भी जा सकते हैं. एल्को-बेव फर्म्स के हाई P/E रेश्यो (High P/E Ratios) बताते हैं कि मार्केट ने पहले ही ग्रोथ को प्राइस इन (Price in) कर लिया है, जिससे वे ऐसे रेगुलेटरी बदलावों के प्रति और भी वल्नरेबल (Vulnerable) हो जाते हैं.
मार्केट आउटलुक और पॉलिसी मिसाल
कर्नाटक का यह AIB मॉडल अन्य राज्यों के लिए एक प्रोग्रेसिव (Progressive) मिसाल बन सकता है, जो ऐसे ही फिस्कल और सोशल इश्यूज से जूझ रहे हैं. ओवरऑल इंडियन एल्कोहॉलिक बेवरेज मार्केट में ग्रोथ की उम्मीद बनी हुई है, जिसका अनुमान FY26 तक 8-10% के आसपास है, जिसका मुख्य कारण प्रीमियमाइजेशन (Premiumization) और बढ़ती आय है. इंडस्ट्री प्लेयर्स को इन डायनामिक स्टेट-लेवल एक्साइज पॉलिसीज पर नजर रखनी होगी, जो पूरे इंडिया में प्राइसिंग, प्रॉफिटेबिलिटी और इन्वेस्टर सेंटीमेंट को प्रभावित करती रहेंगी.
