कर्नाटक में 2025 के गिग वर्कर्स एक्ट को लेकर बड़ी डिलीवरी और राइड-हेलिंग कंपनियों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है। कंपनियों का कहना है कि राज्य का यह कानून केंद्र के नियमों से टकराता है, जिससे अनुपालन लागत (compliance costs) बढ़ सकती है और कानूनी अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
रेगुलेटरी अधिकार क्षेत्र पर टकराव
कर्नाटक प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम, 2025, को एक बड़ी कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। कई बड़ी एग्रीगेटर कंपनियां इसके लागू होने पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं। Swiggy, Zepto, और Uber जैसी कंपनियों ने इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के समर्थन से कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका तर्क है कि राज्य-स्तरीय यह कानून केंद्र सरकार के कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020 के साथ ओवरलैप (overlap) करता है।
असहमति का मुख्य बिंदु यह है कि क्या राज्य सरकार को कल्याणकारी योगदान (welfare contributions) और पंजीकरण प्रक्रियाओं को अनिवार्य करने का अधिकार है, जो राष्ट्रीय कानूनों के तहत पहले से ही कवर हो सकते हैं। संविधान के अनुसार, जब सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर राज्य कानूनों का केंद्रीय कानूनों से टकराव होता है, तो केंद्रीय कानून को प्राथमिकता दी जाती है। कंपनियों को चिंता है कि कर्नाटक का यह एक्ट एक खंडित (fragmented) नियामक माहौल तैयार करेगा, जिससे उन्हें दो तरह के अनुपालन नियमों से निपटना पड़ेगा। इससे उन प्लेटफॉर्म्स के लिए परिचालन लागत (operational costs) और प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं जो कई राज्यों में काम करते हैं।
कल्याण शुल्क का वित्तीय प्रभाव
नए कर्नाटक कानून के तहत, एग्रीगेटर्स को सभी खाद्य और किराना डिलीवरी लेनदेन पर 1% कल्याण शुल्क (welfare fee) का भुगतान करना होगा। साथ ही, राइड-हेलिंग सेवाओं के लिए एक अलग शुल्क संरचना भी है। हालांकि हाई कोर्ट ने फिलहाल कानून को आगे बढ़ने की अनुमति दे दी है, लेकिन उसने यह आदेश दिया है कि कानूनी समीक्षा लंबित रहने तक यह कल्याणकारी योगदान सीधे राज्य के कल्याण कोष में जमा होने के बजाय कोर्ट रजिस्ट्री में जमा किए जाएं। निवेशकों के लिए, यह एक अस्थायी वित्तीय देनदारी है जो अदालती फैसले में कानून के पक्ष में जाने पर स्थायी खर्च बन सकती है, जिससे इन प्लेटफॉर्म्स के ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
संभावित कानूनी और परिचालन जोखिम
यह कानूनी लड़ाई भारत में गिग इकोनॉमी के नियमों को लेकर व्यापक अनिश्चितता को उजागर करती है। हालांकि इस एक्ट का उद्देश्य गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा, शिकायत निवारण और पारदर्शिता प्रदान करना है, लेकिन कानूनी चुनौती कल्याण शुल्क और अनिवार्य वर्कर रजिस्ट्रेशन जैसे विशिष्ट प्रावधानों की वैधता पर सवाल उठाती है। कानूनी विशेषज्ञ इस मामले पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 254 की अदालत की व्याख्या यह तय कर सकती है कि क्या अन्य राज्य भी इसी तरह के कानून लागू कर सकते हैं, या क्या उद्योग को केंद्रीय सरकार के 2020 के कोड के पूर्ण कार्यान्वयन का इंतजार करना होगा।
इस मामले का नतीजा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु होगा, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय मिसाल (national precedent) कायम कर सकता है। निवेशक संभवतः अंतिम निर्णय, केंद्रीय सामाजिक सुरक्षा संहिता (central Code on Social Security) के कार्यान्वयन की स्थिति और गिग प्लेटफॉर्म्स की लागत संरचना में किसी भी संभावित बदलाव के बारे में अपडेट की तलाश करेंगे, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि अंततः उन्हें राज्य-विशिष्ट कल्याण निधियों में योगदान करने की आवश्यकता है या नहीं।
