JPMorgan के एक बड़े अर्थशास्त्री, जहांगीर अजीज, ने कहा है कि भारत का घरेलू कॉरपोरेट निवेश चक्र ग्लोबल AI बूम से उतनी गति नहीं पकड़ पाएगा जितनी उम्मीद की जा रही है। टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स से एक्सपोर्ट को फायदा हो रहा है, लेकिन टिकाऊ कैपिटल स्पेंडिंग एक चुनौती बनी हुई है। इसके अलावा, तेल की बढ़ती कीमतें दूसरी तिमाही के GDP ग्रोथ को भी प्रभावित कर सकती हैं।
कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) में क्यों दिख रही है सुस्ती?
JPMorgan के सीनियर इकोनॉमिस्ट, जहांगीर अजीज, ने भारत के घरेलू प्राइवेट इन्वेस्टमेंट साइकिल को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर दुनिया भर में भले ही उत्साह हो और भारत में नए डेटा सेंटर भी बन रहे हों, लेकिन ये फैक्टर्स कॉरपोरेट की तरफ से बड़े और टिकाऊ कैपिटल स्पेंडिंग को बढ़ावा देने के लिए काफी नहीं हैं।
एक्सपोर्ट को फायदा, पर अंदरूनी निवेश में कमी
भारत ने ग्लोबल टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़े एक्सपोर्ट के मौके तो भुनाए हैं, लेकिन देश के अंदरूनी निवेश का हाल कुछ अलग कहानी कह रहा है। एनालिसिस के मुताबिक, पिछले दस सालों में कॉरपोरेट कैपिटल स्पेंडिंग में सुधार के छोटे-छोटे दौर आए हैं, लेकिन ये तेजी लंबी अवधि का ट्रेंड बनने में नाकाम रही हैं। डेटा सेंटर जैसे प्रोजेक्ट भले ही दिख रहे हों, लेकिन इन्हें व्यापक मैन्युफैक्चरिंग या सर्विस सेक्टर में बड़े निवेश की लहर शुरू करने में सीमित माना जा रहा है।
GDP ग्रोथ पर पड़ सकता है तेल का असर
इन्वेस्टर्स के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत की आर्थिक ग्रोथ दूसरी तिमाही के परफॉर्मेंस को लेकर जांच के दायरे में है। अजीज ने बढ़ती होलसेल कीमतों, खासकर कच्चे तेल की ऊंची लागत के कारण आने वाले स्टैटिस्टिकल प्रेशर की ओर इशारा किया। कीमतों में ये उतार-चढ़ाव GDP ग्रोथ की गणना को मुश्किल बना सकते हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी मजबूती के बावजूद नतीजे उम्मीदों से थोड़े कम रह सकते हैं।
RBI और ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी का खेल
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के बीच संबंधों पर JPMorgan का नजरिया यह है कि दोनों अपनी-अपनी राह पर चलेंगे। अजीज ने कहा कि RBI के फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट रेट हाइक को अपने आप कॉपी करने की संभावना कम है। इसके बजाय, केंद्रीय बैंक घरेलू आर्थिक हालातों को प्राथमिकता देगा और रुपये को सपोर्ट करने के लिए इंटरेस्ट रेट में बदलाव के बजाय लिक्विडिटी मैनेजमेंट के दूसरे तरीकों का इस्तेमाल कर सकता है। यह RBI की उस पुरानी रणनीति को दिखाता है, जहां वह अमेरिकी सेंट्रल बैंक के फैसलों से अलग अपनी पॉलिसी तय करता है।
ग्लोबल मार्केट का मूड और फेड का रुख
भारत से परे देखें तो, ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता का एक बड़ा कारण फेडरल रिजर्व के कम्युनिकेशन में आई मुश्किलें हैं। फेड चेयरमैन के हालिया बयानों के बाद आई अनिश्चितता ने इन्वेस्टर्स को अमेरिकी सेंट्रल बैंक के 2% महंगाई के लक्ष्य के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है। भले ही मार्केट में रेट हाइक की उम्मीदें बनी हुई हैं, लेकिन कब होगा, यह अभी तय नहीं है। JPMorgan फिलहाल दिसंबर तक एक संभावित रेट इंक्रीज का अनुमान लगा रहा है, हालांकि महंगाई के अच्छे आंकड़े इसे सितंबर तक भी ला सकते हैं। भारतीय निवेशकों के लिए, आने वाले महीनों में ग्लोबल रेट के फैसले और तेल की कीमतों में अस्थिरता विदेशी निवेश के फ्लो (Foreign Investment Flows) और घरेलू उधारी लागत (Domestic Borrowing Costs) को कैसे प्रभावित करती है, इस पर नजर रखनी होगी।
