ग्लोबल टेंशन के बीच मजबूत बनी हुई है घरेलू मांग
ईरान में चल रहे युद्ध के कारण भारत की इकोनॉमी पर संकट के बादल छाए हुए हैं। अप्रैल के शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि देश की मजबूत घरेलू मांग (Domestic Demand) ग्रोथ को लगातार बढ़ा रही है। लेकिन, बाहरी सेक्टर में आ रही दिक्कतें इस अच्छी खबर पर भारी पड़ रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस बात पर लगातार नजर रख रहा है कि ईरान युद्ध के कारण एनर्जी की कीमतों में जो उछाल आया है, उसका घरेलू महंगाई (Inflation) पर कितना असर पड़ेगा। इन चुनौतियों के बावजूद, लोगों का खर्च करने का सिलसिला जारी है, जो इकोनॉमिक एक्टिविटी को सहारा दे रहा है।
भू-राजनीतिक जोखिमों से महंगाई की चिंता बढ़ी
RBI की ताजा इकोनॉमिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही महंगाई दर टारगेट के अंदर है, लेकिन ग्लोबल एनर्जी की बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ना एक बड़ी चिंता का विषय है। ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनावों (Geopolitical Tensions) ने सीधे तौर पर कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित किया है। भारत अपनी 80% से ज्यादा तेल की जरूरतें इंपोर्ट (Import) करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है। ऐसे में, यह निर्भरता इंपोर्टेड महंगाई (Imported Inflation) के खतरे को बढ़ाती है। सेंट्रल बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने अप्रैल 2026 में हुई मीटिंग में रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर बरकरार रखा और न्यूट्रल पॉलिसी स्टैंस (Neutral Policy Stance) बनाए रखा। इसका मकसद ग्लोबल जोखिमों और घरेलू ग्रोथ को सहारा देने के बीच संतुलन बनाना था। फिर भी, MPC ने FY2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 4.6% कर दिया है, जिसमें बढ़ती ग्लोबल एनर्जी कीमतों को एक बड़ा जोखिम बताया गया है।
विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) बना सहारा
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) इन ग्लोबल आर्थिक अनिश्चितताओं के खिलाफ एक मजबूत ढाल का काम कर रहा है। 15 मई 2026 को खत्म हुए हफ्ते तक, यह भंडार $688.894 बिलियन था। यह आंकड़ा हाल की ऊंचाई से थोड़ा कम है, जिसका मुख्य कारण RBI का रुपये को स्थिर रखने के लिए फॉरेक्स मार्केट में डॉलर बेचना है। RBI लगातार रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए डॉलर बेच रहा है, जो भू-राजनीतिक उथल-पुथल और ग्लोबल फाइनेंशियल कंडीशन के टाइट होने के कारण बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की है, ताकि इन बाहरी झटकों से निपटने में मदद मिल सके।
बाहरी कमजोरी और पुराने सबक
दुनिया भर की इकोनॉमी इसी तरह की सप्लाई-साइड दिक्कतों का सामना कर रही हैं। भारत की स्थिति इंपोर्टेड कच्चे तेल पर भारी निर्भरता के कारण ज्यादा संवेदनशील है। भले ही अन्य उभरती हुई इकोनॉमी भी महंगाई से जूझ रही हैं, लेकिन भारत का मजबूत फॉरेक्स भंडार कुछ हद तक बेहतर सुरक्षा देता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण तेल की कीमतें बढ़ी हैं, तब-तब भारत में इंपोर्टेड महंगाई और करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ा है। मौजूदा हालात भी इन पुरानी कमजोरियों की याद दिलाते हैं, जो RBI के लिक्विडिटी और महंगाई की उम्मीदों को मैनेज करने के तरीके को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। अप्रैल 2026 में MPC का न्यूट्रल पॉलिसी स्टैंस का फैसला, महंगाई पर काबू पाने और ग्रोथ को बढ़ावा देने के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है।
लगातार बने हुए जोखिम और स्ट्रक्चरल दिक्कतें
घरेलू मांग की मजबूती और फॉरेक्स रिजर्व के सहारे के बावजूद, बड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है, तो सप्लाई चेन में दिक्कतें और बढ़ सकती हैं, जिससे इंडस्ट्री की लागत बढ़ेगी और ग्रोथ धीमी हो सकती है। अगर एनर्जी की बढ़ी हुई कीमतें उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं, तो महंगाई और भड़क सकती है और लोगों की खरीदने की क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा, ग्लोबल फाइनेंशियल कंडीशन का टाइट होना और संभावित कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflow) रुपये पर दबाव बनाए रख सकता है, भले ही RBI दखल दे रहा हो। सरकार द्वारा फॉरेक्स बचाने की अपील, भले ही जरूरी हो, बाहरी खातों पर तनाव का संकेत देती है। तेल इंपोर्ट पर भारत की निर्भरता उसे मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है। ग्लोबल ट्रेड और फाइनेंस में देश की हिस्सेदारी का मतलब है कि दूर की घटनाएं भी स्थानीय आर्थिक अस्थिरता पैदा कर सकती हैं। अल नीनो (El Niño) का कृषि उत्पादन पर पड़ने वाला संभावित असर, खाद्य कीमतों और महंगाई के अनुमान को और जटिल बना सकता है।
आगे की राह: निगरानी और तालमेल
आगे बढ़ते हुए, RBI ग्लोबल और घरेलू इकोनॉमिक माहौल पर अपनी नजर बनाए रखेगा। सेंट्रल बैंक का अनुमान है कि FY2026-27 में CPI महंगाई 4.6% रह सकती है, जिसमें एनर्जी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मौसम संबंधी संभावित दिक्कतें ऊपरी जोखिम पैदा कर सकती हैं। सरकारी नीतियां और RBI द्वारा लिक्विडिटी व रिजर्व का प्रबंधन सहारा प्रदान करेगा। हालांकि, ईरान संघर्ष का असर कितने समय तक और कितना गहरा रहेगा, यह आने वाले महीनों में भारत की आर्थिक ग्रोथ और महंगाई की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
