कैपिटल अकाउंट पर बड़ा दांव
बढ़ते बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) के दबाव को देखते हुए, सरकार आक्रामक रूप से विदेशी पूंजी जुटाने की रणनीति पर काम कर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सरकारी कर्ज (Government Debt) में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए टैक्स की बाधाओं को दूर करके लिक्विडिटी बढ़ाने की कोशिश की है। यह कदम लंबी अवधि के कर्ज सुधारों से ज़्यादा, रुपये को तत्काल स्थिरता देने के लिए उठाया गया है। इसका सीधा मकसद है - भारतीय सरकारी बॉन्ड्स को आकर्षक बनाकर, ऊंचे तेल दामों और लगातार बने व्यापार घाटे (Trade Deficit) के असर को कम करना।
आर्बिट्रेज का मौका कितना?
बाजार को $60 बिलियन से $80 बिलियन तक के विदेशी निवेश की उम्मीद है। लेकिन, इन उपायों की सफलता घरेलू यील्ड (Domestic Yields) और हेजिंग की लागत (Cost of Hedging) के बीच के अंतर पर निर्भर करेगी। FCNR(B) डिपॉजिट्स और सरकारी उपक्रमों (PSUs) के लिए स्वैप (Swap) की नई सुविधाएँ, विदेशी पूंजी के लिए जोखिम की लागत को कम करने के उद्देश्य से बनाई गई हैं। हालांकि, 2013 के FCNR(B) जमाओं से तुलना करें तो वैश्विक परिदृश्य काफी अलग है। उस समय के विपरीत, आज दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (Quantitative Tightening) के दौर से गुज़र रही हैं। इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह निवेश, अमेरिकी ट्रेजरी बाजार (U.S. Treasury Market) की संभावित अस्थिरता का सामना कर पाता है, जो अक्सर उभरते बाजारों (Emerging Markets) में पूंजी के प्रवाह की दिशा तय करता है।
संरचनात्मक जोखिम और मंदी की आशंका
कर्ज आधारित निवेश पर निर्भरता एक बड़ा जोखिम पैदा करती है। भले ही ब्लूमबर्ग जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए इंडेक्स में शामिल होना (Index Inclusion) पैसिव फंड फ्लो (Passive Fund Flows) के लिए एक उत्प्रेरक का काम कर सकता है, लेकिन यह घरेलू बॉन्ड बाजार को वैश्विक 'रिस्क-ऑफ' सेंटिमेंट (Risk-off Sentiment) से भी जोड़ता है। अगर वैश्विक निवेशकों का जोखिम लेने का इरादा बदलता है, तो भारत को तेजी से पूंजी बहिर्वाह (Capital Outflows) का सामना करना पड़ सकता है, जो उन दबावों को और बढ़ाएगा जिन्हें ये उपाय कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा, सरकारी उपक्रमों (PSUs) द्वारा लिए जाने वाले एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग्स (ECBs) पर निर्भरता, राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों को मुद्रा विसंगति (Currency Mismatch) के बढ़ते जोखिम में डाल सकती है, अगर रुपया गिरता रहता है। विश्लेषकों को संदेह है कि क्या ये नीतिगत कदम संरचनात्मक मजबूती प्रदान करेंगे या केवल एक अस्थायी लिक्विडिटी ब्रिज का काम करेंगे जो वित्तीय अनुशासन को टाल देगा।
भविष्य का नज़रिया
बाजार प्रतिभागी स्वैप सुविधाओं के कार्यान्वयन दिशानिर्देशों (Implementation Guidelines) पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, जो सफलता के प्राथमिक बैरोमीटर होंगे। हालांकि शुरुआती आंकड़े सॉवरेन डेट (Sovereign Debt) के सकारात्मक अवशोषण का संकेत देते हैं, लेकिन व्यापक रुझान RBI के महंगाई नियंत्रण के लक्ष्य और सरकार की उधार आवश्यकताओं के बीच संतुलन पर निर्भर करेगा। जैसे-जैसे नीति निर्माता सॉवरेन फॉरेन करेंसी बॉन्ड जारी करने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं, बाजार तीव्र अस्थिरता के दौर का अनुमान लगा रहा है। फिलहाल, ध्यान इस बात पर है कि क्या इन प्रोत्साहनों की लागत, उच्च-दर-लंबे समय (Higher-for-Longer) की ब्याज दर वाले माहौल में अल्पकालिक मुद्रा समर्थन के लाभ से अधिक होगी।
