$1 ट्रिलियन का आर्थिक झटका
साल 2047 तक भारत को $30-40 ट्रिलियन की आर्थिक महाशक्ति बनाने का सपना, बीमारियों के कारण हो रहे $1 ट्रिलियन के सालाना नुकसान से खतरे में पड़ गया है। यह स्वास्थ्य संकट सीधे तौर पर काम करने वाले लोगों की संख्या और उनकी प्रोडक्टिविटी को कम करता है, जिससे देश को मिलने वाले डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा कम हो जाता है। जनसंख्या के स्वास्थ्य में सुधार सिर्फ एक सामाजिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक जरूरी आर्थिक रणनीति है।
बीमारी का भारी खामियाजा
बीमारी के कारण हर साल होने वाला $1 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान, काम करने वालों की घटती संख्या और प्रोडक्टिविटी में कमी के रूप में सामने आता है। सिर्फ नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (NCDs) के कारण 2030 से पहले ही भारत को $4.58 ट्रिलियन का नुकसान होने का अनुमान है, जो आर्थिक उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। स्टडीज बताती हैं कि NCDs से होने वाली मौतों में 10% की बढ़ोतरी सालाना GDP ग्रोथ को 0.5% तक कम कर सकती है। ये बीमारियां परिवारों पर भी भारी बोझ डालती हैं, क्योंकि NCDs कुल स्वास्थ्य खर्च का आधे से ज्यादा हिस्सा 'आउट-ऑफ-पॉकेट' (अपनी जेब से) खर्च करवाती हैं, जिससे परिवार गरीबी में धकेले जा सकते हैं और जीवन के कीमती उत्पादक साल कम हो जाते हैं।
बेहतर स्वास्थ्य से आर्थिक विकास को गति
दुनिया भर में, हेल्थ-एडजस्टेड लाइफ एक्सपेक्टेंसी (HALE) में सुधार का सीधा संबंध GDP पर कैपिटा ग्रोथ से रहा है। 1990 के बाद से भारत की HALE लगभग 50 साल से बढ़कर 61 साल हो गई है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2047 तक HALE को 70 साल तक पहुंचाने से GDP पर कैपिटा में पांच गुना वृद्धि हो सकती है, जो भारत के $18,000-$20,000 प्रति व्यक्ति GDP के लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान देगा। HALE का हर अतिरिक्त साल लगभग 7.5% अधिक GDP पर कैपिटा ग्रोथ से जुड़ा है, और यह फायदा तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब HALE 57 साल के पार चला जाता है। हालांकि, भारत इन स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है, जो इसके डेमोग्राफिक डिविडेंड को सीमित कर रही हैं।
इन्वेस्टमेंट और गवर्नेंस की कमियां
प्रगति के बावजूद, भारत की हेल्थकेयर व्यवस्था बीमारियों के प्रबंधन, फाइनेंसिंग और इंटीग्रेशन में महत्वपूर्ण लक्ष्यों को पूरा करने में संघर्ष कर रही है। हेल्थकेयर पर GDP का 3-4% खर्च हो रहा है, जो अन्य समान देशों में देखे जाने वाले 6-7% की तुलना में कम है। कुल स्वास्थ्य खर्च GDP का लगभग 3.8% है, लेकिन सरकारी खर्च केवल 1.84% के आसपास है, जो 2025 के लिए निर्धारित 2.5% के लक्ष्य से काफी कम है। इसके अलावा, बिखरी हुई गवर्नेंस और फाइनेंसिंग, सर्विस डिलीवरी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एकीकृत फ्रेमवर्क की कमी के कारण अकुशलता बढ़ रही है। यह बिखराव बीमारी के बोझ से लड़ने के लिए जरूरी संसाधनों के प्रभावी आवंटन में बाधा डालता है। नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (NCDs) का बढ़ता बोझ और डेटा सिस्टम का बिखराव देखभाल और नीति नियोजन को और जटिल बना देते हैं।
आगे का रास्ता
स्वास्थ्य चुनौतियों को आर्थिक इंजन में बदलने के लिए भारत को एक रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता है। इसमें मामूली सुधारों से आगे बढ़कर इन्वेस्टमेंट और एग्जीक्यूशन दोनों को बढ़ाना शामिल है। देश को ऐसे यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज पर ध्यान देना होगा जिसमें रोकथाम (prevention) शामिल हो, हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्कफोर्स का विस्तार करना होगा, और डिजिटल हेल्थ सॉल्यूशंस अपनाने होंगे। नीतियों के माध्यम से स्वस्थ व्यवहार को बढ़ावा देना और एकीकृत गवर्नेंस मॉडल स्थापित करना महत्वपूर्ण कदम हैं। स्वास्थ्य को अपनी आबादी में एक रणनीतिक निवेश के रूप में देखकर, भारत अपनी डेमोग्राफिक क्षमता को अनलॉक कर सकता है और एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर आगे बढ़ सकता है।