क्या है नौकरी की असली तस्वीर?
'टाइम यूज़ सर्वे 2024' के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि भारत की आबादी का वो बड़ा हिस्सा जो नौजवान है, उसमें से केवल 46.7 प्रतिशत ही पेड जॉब्स (सैलरी वाली नौकरी) में हैं। यह भारत की युवा शक्ति की क्षमता का बड़ा हिस्सा है जो अभी भी इस्तेमाल नहीं हो पा रहा। जो लोग काम कर भी रहे हैं, उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं: अंडरएम्प्लॉयमेंट (जितनी क्षमता है, उससे कम का काम) और ओवरवर्क (काम के घंटे बहुत ज़्यादा होना)। यह समस्या अनौपचारिक (informal) व्यवसायों में ज़्यादा दिखती है, जहाँ 15.5 प्रतिशत वर्कर दिन में 4 घंटे से भी कम काम करते हैं, जबकि औपचारिक (formal) सेक्टर में यह आंकड़ा केवल 3.6 प्रतिशत है। वहीं, दूसरी ओर, औपचारिक सेक्टर में एक चौथाई से ज़्यादा युवा 8 घंटे से ज़्यादा काम करने को मजबूर हैं, जो कि काम के घंटों के अनुचित बँटवारे और सेक्टर-विशिष्ट समस्याओं को दर्शाता है।
रोज़मर्रा का लंबा सफ़र
नौजवानों को रोज़ काम पर जाने-आने में औसतन 50 मिनट लगते हैं। शहरों में रहने वाले लोगों को 56 मिनट लगते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह समय 44 मिनट है। यह रोज़ का सफ़र काम से जुड़े कुल घंटों को काफी बढ़ा देता है। औपचारिक कंपनियों में काम करने वाले लगभग 36.6 प्रतिशत लोग काम और सफ़र को मिलाकर 9 घंटे से ज़्यादा समय लगाते हैं। यह लंबा समय कहीं न कहीं खराब सार्वजनिक परिवहन, जॉब सेंटर्स के पास ऊँचे किराये और आवागमन के ज़्यादा प्रभावी साधनों की कमी जैसी गहरी संरचनात्मक समस्याओं की ओर इशारा करता है।
स्किल गैप और AI का खतरा
भारत में एक बड़ी समस्या है कि कंपनियाँ AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) स्किल्स वाले लोगों को आसानी से नहीं ढूंढ पातीं। हालात यह है कि ज़्यादातर ग्रेजुएट्स के पास ज़रूरी AI स्किल्स नहीं हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक AI ऑटोमेशन से भारत में 3.8 करोड़ (38 million) नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं, खासकर एंट्री-लेवल की नौकरियाँ। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अनुसार, AI जहां 2025 तक दुनिया भर में 8.5 करोड़ (85 million) नौकरियाँ खत्म कर सकता है, वहीं 9.7 करोड़ (97 million) नई नौकरियाँ भी पैदा कर सकता है। मुख्य चुनौती यह है कि मौजूदा और आने वाले कर्मचारियों को इस बदलाव के लिए तैयार किया जाए। यह तकनीकी बदलाव, खासकर सर्विस सेक्टर में रूटीन ऑफिस जॉब्स में, नौकरी में भागीदारी का अंतर बढ़ा सकता है।
जेंडर और भूगोल के आधार पर असमानता
नौकरी के मामलों में लिंग और भौगोलिक स्थिति के आधार पर भी बड़ी भिन्नताएँ दिखती हैं। जहाँ पुरुष आमतौर पर ज़्यादा पेड आवर्स (वेतन वाले घंटे) काम करते हैं, वहीं महिलाओं के कुल काम के घंटे (बिना भुगतान वाले घरेलू और देखभाल के काम सहित) कहीं ज़्यादा होते हैं। यह 'अदृश्य श्रम' है जिसे अक्सर सरकारी आँकड़ों में गिना नहीं जाता। भौगोलिक रूप से, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे अमीर राज्यों में काम और सफ़र का कुल समय 9 घंटे से ज़्यादा है, जो एक ज़्यादा समय लेने वाली वर्क कल्चर का संकेत देता है। इसके विपरीत, पूर्वी और मध्य भारत के राज्यों में अंडरएम्प्लॉयमेंट के संकेत ज़्यादा मिलते हैं।
अनौपचारिक सेक्टर की मुश्किल
भारत के लेबर मार्केट की सबसे बड़ी कमजोरी अनौपचारिक सेक्टर पर ज़्यादा निर्भरता है, जिसमें करीब 90 प्रतिशत वर्कफ़ोर्स काम करती है। इन श्रमिकों के पास अक्सर जॉब सिक्योरिटी, लिखित कॉन्ट्रैक्ट, पेड लीव और सामाजिक सुरक्षा लाभों की कमी होती है, जिससे वे बहुत असुरक्षित हो जाते हैं। हालाँकि हालिया आँकड़े बताते हैं कि औपचारिक रोज़गार में कुछ ग्रोथ हुई है और समग्र बेरोजगारी दर में मामूली कमी आई है, लेकिन यह प्रगति नाजुक है। 'एम्प्लॉयमेंट' की परिभाषा, जिसमें हफ़्ते में सिर्फ़ एक घंटा काम करने वाले को भी गिना जाता है, अंडरएम्प्लॉयमेंट और अस्थिर नौकरियों की हकीकत को छुपा सकती है। इसके अलावा, पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी दर ज़्यादा है, जो उनकी शिक्षा और उपलब्ध नौकरियों के बीच एक बड़े गैप को दर्शाता है।
आगे का रास्ता: री-स्किलिंग और रोज़गार का सृजन
इस बदलते जॉब मार्केट से निपटने के लिए, नौजवानों को लगातार सीखते रहने और ऐसे ख़ास स्किल्स (कौशल) हासिल करने की ज़रूरत है जो टेक्नोलॉजी के साथ काम कर सकें या ऐसे काम कर सकें जो AI न कर सके। AI और मशीन लर्निंग स्पेशलिस्ट, डेटा एनालिस्ट और साइबर सिक्योरिटी प्रोफेशनल जैसे पदों पर अच्छी ग्रोथ की उम्मीद है। ILO और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाएँ स्किल गैप को पाटने और एक लचीली वर्कफ़ोर्स बनाने के लिए री-स्किलिंग और ट्रेनिंग को बहुत ज़रूरी बताती हैं। ज़्यादा अच्छी नौकरियों तक पहुँच, खासकर महिलाओं के लिए, और केयर वर्क जैसे क्षेत्रों में निवेश लाखों नौकरियाँ पैदा कर सकता है। भारत की युवा आबादी का लाभ उठाने के लिए, प्राइवेट बिज़नेस के ज़रिए नौकरियाँ खड़ी करना और नौजवानों को तेज़ी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी स्किल्स से लैस करना अहम है।
