Live News ›

चुनावी वादों का चक्रव्यूह: भारत में बढ़ रहा कर्ज, सुस्त पड़े अहम सुधार

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
चुनावी वादों का चक्रव्यूह: भारत में बढ़ रहा कर्ज, सुस्त पड़े अहम सुधार
Overview

भारत में चुनावी वादे अब राज्य सरकारों के लिए 'फिस्कल इल्यूजन' (fiscal illusion) बन गए हैं। इसका मतलब है कि तात्कालिक वोट बैंक को साधने के लिए दिए जाने वाले वादे, सरकारों के बढ़ते कर्ज को छुपा रहे हैं और साथ ही भविष्य के लिए जरूरी आर्थिक सुधारों को भी टाल रहे हैं।

चुनावी वादों का बढ़ता बोझ: क्या है "फिस्कल इल्यूजन"?

जैसे-जैसे भारत में विधानसभा चुनाव नजदीक आते हैं, राजनीतिक दलों के बीच कल्याणकारी योजनाओं (welfare schemes) का वादा करने की होड़ मच जाती है। पार्टियां कैश ट्रांसफर, सब्सिडी और पेंशन बढ़ाने जैसे वादे करती हैं। इस चुनावी मुकाबले में, नेता इस बात पर ज्यादा चर्चा नहीं करते कि इन वादों को पूरा कैसे किया जाएगा या दूसरी जरूरी सेवाओं से क्या कटौती करनी होगी। यह रणनीति मतदाताओं को इन वादों के छिपे हुए, लंबे समय के खर्चों से अनजान रखती है, जिसे 'फिस्कल इल्यूजन' कहा जाता है।

राज्यों के खजाने पर दबाव

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, राज्यों द्वारा सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं पर किया जाने वाला खर्च अब देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 2% तक पहुंच गया है। यह बड़ी रकम सीधे राज्य सरकारों के वित्तीय स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। कई राज्यों पर कर्ज का बोझ काफी बढ़ गया है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु का कर्ज उसके GSDP का 25% से अधिक है, केरल में यह 30% के मध्य तक है, और पश्चिम बंगाल में यह 30% के ऊपरी स्तर के करीब है। ये आंकड़े भले ही तुरंत संकट का संकेत न दें, लेकिन ये भविष्य में नीतिगत फैसले लेने की राज्यों की क्षमता को काफी सीमित करते हैं और आर्थिक झटकों से निपटने या विकास में निवेश करने की उनकी शक्ति को कम करते हैं।

खोए हुए अवसर: न्यायपालिका और सुधारों की अनदेखी

जब पैसा तात्कालिक कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होता है, तो वह महत्वपूर्ण, लंबे समय के संस्थागत निवेशों के लिए उपलब्ध नहीं रहता। भारत की न्याय प्रणाली में समस्याएं इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। विभिन्न न्यायाधिकरणों (tribunals) में कर्मचारियों की लगातार कमी बनी हुई है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) जैसे महत्वपूर्ण निकायों में लगभग एक तिहाई स्वीकृत पद खाली पड़े हैं, जिससे मामलों का निपटारा लंबा खिंच रहा है। इससे इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code) जैसे सुधारों की प्रभावशीलता पर सीधा असर पड़ रहा है। Insolvency and Bankruptcy Board of India के आंकड़ों के अनुसार, देरी के कारण मामलों में संपत्ति का मूल्य घट जाता है, जिससे लेनदारों को 60-70% तक का भारी नुकसान (haircuts) होता है, जो कि कानूनी 330-दिन के समाधान लक्ष्य से कहीं अधिक है।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) में एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार (S. Subramaniam Balaji vs. Govt. of Tamil Nadu) का मामला इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या का इंतजार कर रहा है। इस मामले का उद्देश्य यह तय करना है कि क्या चुनावों से ठीक पहले सार्वजनिक धन से किए गए कल्याणकारी वादे चुनाव को अनुचित रूप से प्रभावित करते हैं या संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करते हैं। 2013 के बालाजी फैसले ने कल्याणकारी योजनाओं पर प्रतिबंध नहीं लगाया था, लेकिन चुनावों के करीब किए गए ऐसे वादों पर सवाल उठाए थे जो चुनावी निष्पक्षता को बिगाड़ सकते हैं। एक बड़ी पीठ से स्पष्ट दिशानिर्देशों के अभाव में, चुनावी प्रतिस्पर्धा अनिश्चितता के ऐसे क्षेत्र में जारी है जहां स्वीकार्य कल्याण, चुनावी प्रलोभन और जिम्मेदार खर्च के बीच की रेखाएं धुंधली हैं।

आर्थिक जोखिम और भविष्य की राह

राज्यों द्वारा लोकप्रिय कार्यक्रमों पर दीर्घकालिक वित्तीय स्वास्थ्य से ज्यादा खर्च करने का वर्तमान मार्ग कई संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है। उच्च कर्ज के स्तर के कारण राज्य बाहरी आर्थिक झटकों, ब्याज दरों में बदलाव या वैश्विक वित्तीय दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इसके अलावा, न्याय प्रणाली में सुधार जैसे महत्वपूर्ण संस्थागत निवेशों से धन का विचलन भारत की सतत आर्थिक वृद्धि की क्षमता को नुकसान पहुंचाता है। सुप्रीम कोर्ट से चुनावी वादों पर अनिश्चितता की स्थिति वित्तीय रूप से जोखिम भरे वादों को और प्रोत्साहित कर सकती है। अदालतों और न्यायाधिकरणों में अदक्षता, लंबी देरी और दिवालियापन समाधानों में महत्वपूर्ण नुकसान के रूप में दिखाई देती है, जो निवेश को हतोत्साहित करती है। एस. सुब्रमण्यम बालाजी मामले का समाधान भारतीय राजनीति में वित्तीय अनुशासन के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है। स्पष्ट दिशानिर्देशों से जवाबदेही बढ़ सकती है और पार्टियों को वादों को वित्तीय वास्तविकताओं से मिलाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

Disclaimer:This content is for informational purposes only and does not constitute financial or investment advice. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making decisions. Investments are subject to market risks, and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors are not liable for any losses. Accuracy and completeness are not guaranteed, and views expressed may not reflect the publication’s editorial stance.