शहरी इंफ्रा के लिए बड़ी तैयारी
भारत को तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक विकास को सहारा देने के लिए 2037 तक शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में करीब ₹80 लाख करोड़ के भारी-भरकम निवेश की ज़रूरत है। शहरों से 2036 तक देश के GDP का लगभग 70% हिस्सा आने की उम्मीद है, ऐसे में मजबूत शहरी वित्त (Urban Finance) की जरूरत और भी बढ़ जाती है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने ₹1 लाख करोड़ का अर्बन चैलेंज फंड (UCF) लॉन्च किया है। यह फंड सीधे ग्रांट (Grants) पर निर्भरता से एक बड़ा बदलाव है, और अब शहरों की सरकारों को मार्केट-बेस्ड फाइनेंसिंग (Market-based financing) की ओर बढ़ना होगा।
UCF के तहत, शहरों को अपने प्रोजेक्ट की कुल लागत का कम से कम 50% म्युनिसिपल बॉन्ड (Municipal Bonds), बैंक लोन (Bank Loans) या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPPs) के ज़रिये जुटाना होगा। केंद्र सरकार 25% लागत कवर करेगी, जबकि बाकी हिस्सा राज्य या शहर खुद वहन करेंगे। इस मॉडल का मकसद शहरों के फाइनेंशियल मैनेजमेंट (Financial Management) को बेहतर बनाना, पारदर्शिता बढ़ाना और उनकी क्रेडिट रेटिंग (Credit Ratings) को सुधारना है, ताकि वे कैपिटल मार्केट (Capital Markets) से फंड जुटा सकें। अच्छी बात यह है कि म्युनिसिपल बॉन्ड पर लगने वाले रिस्क प्रीमियम (Risk Premiums) में बड़ी कमी आई है, जो FY20 के करीब 480 bps से घटकर FY26 तक लगभग 155 bps रह गए हैं। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।
म्युनिसिपल बॉन्ड मार्केट: अभी शुरुआती दौर में
भारतीय म्युनिसिपल बॉन्ड मार्केट अभी भी अपने शुरुआती चरण में है, हालांकि इसमें सुधार के संकेत दिख रहे हैं। FY18 से अब तक, सिर्फ 17 शहरों ने म्युनिसिपल बॉन्ड जारी कर करीब ₹45.4 अरब जुटाए हैं। यह आंकड़ा इस फंड के बड़े अनटैप्ड पोटेंशियल (Untapped potential) को दर्शाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने हाल ही में म्युनिसिपल बॉन्ड को रेपो ट्रांजैक्शन्स (Repo transactions) में कोलैटरल (Collateral) के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाज़त दी है, जिससे मार्केट लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ सकती है और शहरों के लिए उधारी की लागत कम हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, म्युनिसिपल बॉन्ड इश्यू (Issuance) छोटे रहे हैं, और 2006 से 2016 के बीच इसमें बड़ी गिरावट देखी गई थी, जिसका एक कारण सरकारी ग्रांट्स का आसानी से उपलब्ध होना था। AMRUT जैसी स्कीम्स ने कुछ इश्यूज़ को बढ़ावा दिया है, और मार्च 2026 तक कुल ₹4,540 करोड़ तक का आंकड़ा छूने का अनुमान है।
हालांकि, ग्लोबल स्तर पर यह मार्केट बहुत छोटा है। 30 सितंबर, 2025 तक, भारत का म्युनिसिपल बॉन्ड मार्केट कुल आउटस्टैंडिंग कॉर्पोरेट बॉन्ड इश्यू का 0.06% से भी कम है। इन बॉन्ड के लिए मार्केट काफी इलिक्विड (Illiquid) भी है, और एक कमजोर सेकेंडरी मार्केट (Secondary Market) निवेशकों के एग्जिट ऑप्शन्स (Exit options) को सीमित करता है, जिससे यह अन्य निवेशों की तुलना में कम आकर्षक हो जाता है।
छोटे शहरों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
UCF का मार्केट फाइनेंस पर जोर छोटे टियर-II और टियर-III शहरों के लिए बड़ी बाधाएं पैदा कर रहा है। इन शहरों की सरकारों के पास अक्सर आय के सीमित सोर्स (Sources) होते हैं, जो GDP का 0.4% से भी कम राजस्व उत्पन्न करते हैं, जो ग्लोबल एवरेज (Global averages) से काफी कम है। वे काफी हद तक केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले ग्रांट्स और ट्रांसफर पर निर्भर रहते हैं। यह निर्भरता तब और बढ़ी जब पुराने टैक्स सोर्स जैसे ऑक्ट्रोई (Octroi) और एंट्री टैक्स (Entry Tax) को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में शामिल कर लिया गया, जिससे उनकी फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस (Financial independence) कमजोर हो गई।
इसके अलावा, ज़्यादातर भारतीय म्युनिसिपैलिटीज़ (Municipalities) की रेटिंग इन्वेस्टमेंट ग्रेड (Investment grade) से नीचे है, जबकि अमेरिका की करीब 99% म्युनिसिपैलिटीज़ की रेटिंग अच्छी है। छोटे शहरों में बड़े शहरों की तुलना में फंड के लिए तैयार प्रोजेक्ट प्रपोजल (Project proposals) बनाने, डेडिकेटेड प्रोजेक्ट कंपनियां स्थापित करने या कॉम्प्रिहेंसिव PPP डॉक्यूमेंट (PPP documents) ड्राफ्ट करने की क्षमता भी कम होती है। नतीजतन, बड़े मेट्रोपॉलिटन एरियाज़ के बाहर शहरी PPPs का 10% से भी कम हिस्सा होता है।
छोटे शहरों को मदद करने के लिए डिजाइन की गई क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी स्कीम (Credit Repayment Guarantee Scheme) में कुछ सीमाएं हो सकती हैं। स्मॉल बिज़नेस (Small businesses) के लिए इसी तरह की गारंटी स्कीम्स में अक्सर हाई डिफॉल्ट रेट (High default rates) देखे गए हैं और यह फंडामेंटली खराब फाइनेंस वाली संस्थाओं के लिए लेंडिंग रिस्क (Lending risks) को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है। क्रेडिट असेसमेंट (Credit assessment) के लिए 'ओन रेवेन्यू' (Own revenue) को प्राथमिकता देना और ग्रांट्स को कम आंकना एक बड़ी चुनौती है। यह संभव है कि बेहतर सर्विसेज की गारंटी के बिना निवासियों पर फाइनेंस का बोझ बढ़ जाए।
शहरी विकास में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPPs) आम हैं, लेकिन क्षमता की कमी के कारण शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विसेज की डिलीवरी में उनकी सफलता सीमित रही है। वर्तमान 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड (Bond yield) के करीब 7.05% के साथ, म्युनिसिपल बॉन्ड को निवेशकों को आकर्षित करने के लिए क्रेडिट रिस्क (Credit risks) को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्पर्धी दरें (Competitive rates) देनी होंगी। यह छोटे, कम क्रेडिटवर्दी शहरों के लिए मुश्किल है।
संभावित समाधान और भविष्य का नज़रिया
SEBI जैसे रेगुलेटर्स (Regulators) म्युनिसिपल बॉन्ड को और आकर्षक बनाने के लिए रिफॉर्म्स (Reforms) का प्रस्ताव कर रहे हैं। इसमें डेट रीफाइनेंसिंग (Debt refinancing) की इजाज़त देना और छोटे म्युनिसिपैलिटीज़ की मदद के लिए पूल्ड फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर्स (Pooled financing structures) का परिचय शामिल है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकारी नीतियों और निवेशकों की बढ़ती रुचि के समर्थन से म्युनिसिपल बॉन्ड इश्यूज़ में ग्रोथ जारी रहेगी। FY26 से FY34 तक सालाना इश्यूज़ ₹2,500–₹3,000 करोड़ के बीच रहने का अनुमान है। हालांकि, UCF की अंतिम सफलता छोटे शहर की सरकारों की अंदरूनी फाइनेंशियल प्रॉब्लम्स (Financial problems) और रिसोर्सेज (Resources) की कमी को दूर करने पर निर्भर करती है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि विकास समान हो और इंफ्रास्ट्रक्चर व सर्विसेज में सुधार के बिना बहुत अधिक कर्ज न हो, यह बहुत ज़रूरी है।