मार्च के ट्रेड आंकड़े: आयात और निर्यात दोनों में गिरावट
भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट मार्च में घटकर $20.98 बिलियन रहा, जो पिछले साल के $21.69 बिलियन से कम है। लेकिन, यह अच्छी खबर इसलिए नहीं है क्योंकि निर्यात (Exports) में बढ़ोतरी नहीं हुई, बल्कि आयात (Imports) और निर्यात दोनों में एक साथ गिरावट आई है। यह एक व्यापक आर्थिक सुस्ती का संकेत है, जो वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों से प्रभावित है।
आंकड़ों से कमजोर पड़ती मांग के संकेत
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में $20.98 बिलियन का डेफिसिट रहा, जो अर्थशास्त्रियों की $32.75 बिलियन की उम्मीद से काफी कम था। फरवरी 2026 में यह डेफिसिट $27.1 बिलियन था। इस दौरान, आयात (Imports) साल-दर-साल 6% घटकर $59.9 बिलियन रहे, जबकि निर्यात (Exports) 7.5% गिरकर $38.92 बिलियन पर आ गए। यह दोहरी गिरावट घरेलू मांग (Domestic Demand) में कमजोरी और विदेशों में भारतीय सामानों की मांग घटने का संकेत देती है।
वैश्विक दबाव: भू-राजनीति और मांग की कमजोरी
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान से जुड़ा संघर्ष, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों को बाधित कर रहा है। इससे फ्रेट (Freight) और बीमा लागत (Insurance Costs) बढ़ गई है, जिसका असर भारत के व्यापार और ऊर्जा आयात पर पड़ रहा है। इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक मंदी ने प्रमुख व्यापारिक भागीदारों की मांग को भी धीमा कर दिया है।
सर्विसेज एक्सपोर्ट्स दे रहे सहारा
हालांकि, सोने, चांदी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात के पहले मजबूत रहने वाले क्षेत्रों में मार्च में गिरावट देखी गई, जो मांग में समग्र गिरावट की ओर इशारा करता है। वहीं, भारत का सर्विसेज एक्सपोर्ट (Services Exports) एक मजबूत सहारा बना हुआ है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए यह $418.31 बिलियन रहने का अनुमान है। यह सेवाओं का निर्यात व्यापार घाटे को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, और इस क्षेत्र के बढ़ते महत्व को रेखांकित करता है।
वार्षिक घाटा और ऐतिहासिक संदर्भ
पूरे फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए, भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट $333.204 बिलियन रहा, जो पिछले साल के $261.80 बिलियन से अधिक है। भारत 1980 से लगातार व्यापार घाटा दर्ज कर रहा है, जिसका मुख्य कारण ईंधन और कीमती पत्थरों का बड़ा आयात है।
विश्लेषकों की चेतावनी और अमेरिकी व्यापार वार्ता
खाड़ी शिपिंग मार्गों पर भारत की निर्भरता इसे क्षेत्रीय संघर्षों और बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागतों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। व्यापार में आई यह दोहरी गिरावट मांग में कमजोरी का संकेत देती है, जिससे आर्थिक कमजोरी के लंबा खिंचने का खतरा है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें भी व्यापार संतुलन और सरकारी खर्चों पर दबाव डाल सकती हैं। BNP Paribas ने कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण 2026 के लिए अपने इक्विटी मार्केट के टारगेट को कम करते हुए, फिस्कल और ट्रेड बैलेंस पर दबाव की चेतावनी दी है। वहीं, अमेरिका द्वारा की जा रही व्यापार जांच और बदलते टैरिफ (Tariffs) भारतीय निर्यातकों के लिए और अधिक अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं।
आर्थिक विकास के अनुमान मजबूत बने हुए हैं
इन चुनौतियों के बावजूद, विश्लेषक भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर आशावादी बने हुए हैं। अगले हफ्ते वाशिंगटन में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल व्यापार वार्ता के लिए जाने वाला है, जिसका फोकस फरवरी में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे को अंतिम रूप देने पर होगा। इस समझौते में भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ (Tariffs) कम करने की योजना शामिल है। Goldman Sachs का अनुमान है कि 2026 में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ 6.9% रहेगी, और करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए जीडीपी का लगभग 1.0% रहने की उम्मीद है। भारत के विकास पथ के लिए घरेलू मांग और सुधारों पर लगातार ध्यान देना महत्वपूर्ण है।