भारत-चीन व्यापार घाटा रिकॉर्ड पर! FY26 में $112.6 अरब डॉलर पार, आयात में भारी उछाल

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत-चीन व्यापार घाटा रिकॉर्ड पर! FY26 में $112.6 अरब डॉलर पार, आयात में भारी उछाल
Overview

भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा (Trade Deficit) फाइनेंशियल ईयर **2025-26** में रिकॉर्ड **$112.6 अरब डॉलर** पर पहुंच गया है। चीन से आयात (Imports) में **16%** की भारी बढ़ोतरी के चलते यह आंकड़ा पिछले साल के **$99.2 अरब डॉलर** के घाटे को पार कर गया।

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रिकॉर्ड व्यापार घाटे की वजह?

यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि भारत की फैक्ट्रियों को अभी भी चीनी सामानों पर काफी हद तक निर्भर रहना पड़ता है। वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक, चीन से भारत में आयात (Imports) 16% बढ़कर $131.63 अरब डॉलर तक पहुंच गया। वहीं, दूसरी ओर निर्यात (Exports) में 37% की जोरदार उछाल के बावजूद, यह सिर्फ $19.47 अरब डॉलर ही रहा। नतीजा यह हुआ कि व्यापार घाटा पिछले साल के $99.2 अरब डॉलर से बढ़कर $112.6 अरब डॉलर हो गया। यह बताता है कि भारत अपने उद्योगों के लिए कितना ज़्यादा आयात पर निर्भर है, जो 1990 के दशक के अंत में 1 अरब डॉलर से भी कम था।

चीन से इंपोर्ट क्यों ज़रूरी?

दरअसल, भारत के लिए चीन से पूरी तरह आर्थिक संबंध तोड़ना फिलहाल व्यावहारिक नहीं लगता। भारत की मैन्युफैक्चरिंग के लिए चीनी कंपोनेंट्स (Components) और कच्चे माल बेहद ज़रूरी हैं। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा जैसे अहम सेक्टरों के लिए सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री (APIs), कार पार्ट्स और मशीनरी मुख्य रूप से चीन से ही आती हैं। जैसे-जैसे भारत अपना औद्योगिक आधार बढ़ा रहा है, इन बुनियादी आयात की ज़रूरतें स्वाभाविक रूप से बढ़ रही हैं, जिससे व्यापार का यह बड़ा असंतुलन और गहरा रहा है।

भारत की दो-तरफ़ा रणनीति: 'मेक इन इंडिया' और नए सप्लायर्स

इस असंतुलन को दूर करने के लिए भारत सरकार एक दो-तरफ़ा रणनीति अपना रही है। पहला, 'प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) जैसी योजनाओं के ज़रिए घरेलू उत्पादन (Domestic Manufacturing) को बढ़ावा देना और अपनी सप्लाई चेन (Supply Chain) को मज़बूत करना। इस स्कीम से खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो सेक्टर में अच्छी हलचल देखी गई है।

दूसरा, भारत उन प्रोडक्ट्स की पहचान कर रहा है जो ज़्यादातर चीन से इंपोर्ट होते हैं, और ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान और यूरोपीय संघ (EU) जैसे देशों में वैकल्पिक सप्लायर्स (Suppliers) की तलाश कर रहा है। हालांकि, इन नए बाज़ारों से सामान मंगाना, खासकर सेमीकंडक्टर और जटिल मशीनरी जैसे एडवांस्ड आइटम्स के लिए, अपनी चुनौतियां और ज़्यादा लागत लेकर आ सकता है।

व्यापार असंतुलन के छिपे जोखिम

लगातार बढ़ता व्यापार घाटा भारत की अर्थव्यवस्था की एक बड़ी कमज़ोरी की ओर इशारा करता है। चीन की विशाल और किफ़ायती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के कारण, यदि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में कोई भी बाधा आती है, तो यह भारत के उत्पादन और निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। चीन से लगातार बढ़ते आयात, यहां तक कि उन वस्तुओं के लिए भी जिनका भारत दोबारा निर्यात करता है, यह दर्शाता है कि भारत अभी भी चीन के व्यापक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क का हिस्सा है, न कि पूरी तरह से स्वतंत्र।

आगे का रास्ता: एक मज़बूत रणनीति

भारतीय नीति निर्माताओं के सामने अब एक सावधानी भरी रणनीति है। चीन से पूरी तरह अलग होने के बजाय व्यापार को 'डी-रिस्क' करने की सरकार की यह सोच मौजूदा आर्थिक स्थिति का एक व्यावहारिक नज़रिया है। PLI जैसी योजनाओं के माध्यम से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में निरंतर निवेश और सप्लायर्स का विविधीकरण (Diversification) महत्वपूर्ण है। हालांकि, औद्योगिक विकास के लिए चीनी पुर्ज़ों पर भारत की निर्भरता रातों-रात खत्म नहीं होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी जल्दी प्रतिस्पर्धी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग विकसित कर पाता है और अपने फैक्ट्री सेक्टर की वृद्धि को धीमा किए बिना भरोसेमंद, किफ़ायती विकल्प ढूंढ पाता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.