व्यापार का दांव और हकीकत
अगले छह महीनों में कई बड़े ट्रेड पैक्ट्स को फाइनल करने की कोशिशें भारत की आर्थिक कूटनीति में एक बड़ा बदलाव ला रही हैं। यूनाइटेड स्टेट्स, यूरोपियन यूनियन और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के साथ होने वाले समझौतों से सरकार भारत को ग्लोबल वैल्यू चेन्स का एक अहम हिस्सा बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। ओमान और EFTA जैसे देशों के साथ हालिया समझौतों के बाद यह गहमागहमी तेज हुई है। लेकिन, इनগুলোর को लेकर जो उम्मीदें हैं, वो असल आर्थिक हकीकत के सामने फीकी पड़ रही हैं। अप्रैल 2026 तक, मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट 28.4 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो बढ़ती इंपोर्ट और एनर्जी व इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में भारी प्राइस प्रेशर का नतीजा है।
स्ट्रक्चरल अड़चनें
सरकार इनগুলোর को इनोवेशन और एक्सपोर्ट-बेस्ड ग्रोथ का जरिया बता रही है, लेकिन इकोनॉमिक डेटा कुछ और ही कहानी कहता है। भारत के मौजूदा ट्रेड एग्रीमेंट्स का इस्तेमाल लगभग 25% तक ही हो पा रहा है, जबकि विकसित देशों में यह दर 70-80% है। आलोचकों का कहना है कि सिर्फ टैरिफ कम करने से गहरी स्ट्रक्चरल समस्याएं हल नहीं होंगी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अभी भी हाई लॉजिस्टिक्स कॉस्ट, बिखरी हुई सप्लाई चेन्स और इंपोर्टेड कच्चे माल पर निर्भरता जैसी दिक्कतों से जूझ रहा है। भले ही इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स जैसे हाई-टेक इनिशिएटिव्स रफ्तार पकड़ रहे हैं, लेकिन प्रोडक्शन का 'असेंबली-हैवी' नेचर इन नए ट्रेड पैक्ट्स से मिलने वाले वैल्यू-एडेड फायदों को सीमित कर रहा है।
एक्सपर्ट्स की चिंताएं
तेज़ी से ट्रेड लिबरलाइजेशन की कोशिशों में डोमेस्टिक इंडस्ट्री के लिए बड़े जोखिम छिपे हैं। एनालिस्ट्स को चिंता है कि केमिकल्स, मशीनरी और फार्मा जैसे सेक्टर्स में अचानक टैरिफ कम करने से छोटे और मध्यम आकार के बिज़नेस, ज्यादा एफिशिएंट और भारी सब्सिडी वाली विदेशी कंपनियों के सामने टिक नहीं पाएंगे। इसके अलावा, 'इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन' का विरोधाभास भी बना हुआ है: लक्ष्य बाहरी बाजारों पर निर्भरता कम करना है, लेकिन ट्रेड डेफिसिट लगातार बढ़ता जा रहा है। एनर्जी की बढ़ती लागत, ग्लोबल सप्लाई रूट में आई दिक्कतों के साथ मिलकर, एक्सपोर्ट ग्रोथ के फायदों पर भारी पड़ रही है। इंडस्ट्री लीडर्स ने भी कई बार इनগুলোর पर निराशा जताई है, उनका कहना है कि इनগুলোর में अक्सर डोमेस्टिक मार्केट के लिए बराबर एक्सेस या सुरक्षा का अभाव होता है।
2027 की ओर
आगे चलकर, भारत की ट्रेड स्ट्रेटेजी की सफलता सिर्फ साइन किए गए पैक्ट्स की संख्या पर नहीं, बल्कि हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग सेगमेंट्स में इंटीग्रेट होने की क्षमता पर निर्भर करेगी। सरकार का R&D, डिजाइन और ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी की ओर झुकाव इन दबावों का सीधा जवाब है, जिसका मकसद बेसिक असेंबली से आगे बढ़ना है। भले ही मौजूदा ट्रेड डेफिसिट एक बड़ी कमजोरी बना हुआ है, 'सनराइज इंडस्ट्रीज' पर फोकस टेक्नोलॉजिकल सेल्फ-रिलायंस पर एक लॉन्ग-टर्म बेट को दर्शाता है। एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर ये स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स सफल होते हैं, तो देश की बाहरी बैलेंस में स्थिरता आ सकती है, हालांकि 2026 और 2027 का ट्रांज़िशन पीरियड थोड़ा वोलेटाइल रह सकता है।
