टैक्स के पैसे से 'ग्रीन' ग्रोथ का रोडमैप
सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (CSEP) के एक नए पेपर में एक अहम प्रस्ताव दिया गया है। इसके तहत, भारत अपने जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) से होने वाली टैक्स कमाई का इस्तेमाल ग्रीन एनर्जी ट्रांसमिशन (Renewable Energy Transmission) और उन इंडस्ट्रीज की एफिशिएंसी (Industrial Efficiency) बढ़ाने में कर सकता है जहां कार्बन उत्सर्जन कम करना मुश्किल है (Hard-to-Abate Sectors)। यह पूरा प्लान 'फिस्कली न्यूट्रल' है, यानी इसके लिए न कोई नया टैक्स लगाया जाएगा और न ही सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा।
₹75,000 करोड़ से ज्यादा का 'ट्रिपल डिविडेंड'
इस प्रस्ताव के अनुसार, कोयला जीएसटी (Coal GST) और तेल व गैस पर लगने वाले स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) व रोड एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस (Road and Infrastructure Cess) जैसे मौजूदा टैक्स से हर साल ₹75,166 करोड़ से ज्यादा जुटाए जा सकते हैं। इस पैसे का इस्तेमाल करके भारत को तीन बड़े फायदे मिलेंगे: पहला, इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) को बूस्ट, दूसरा, कार्बन एमिशन इंटेंसिटी (Emissions Intensity) में भारी कमी, और तीसरा, आम लोगों की आय (Household Incomes) में सुधार। पेपर में यह भी सुझाया गया है कि अगर सारा पैसा रिन्यूएबल एनर्जी ट्रांसमिशन सिस्टम में लगाया जाए, तो जीडीपी (GDP) को सबसे ज्यादा फायदा होगा, क्योंकि इसका असर कंस्ट्रक्शन, मशीनरी, एग्रीकल्चर और सर्विसेज जैसे कई सेक्टर्स पर पड़ेगा।
भारत की 'नेट जीरो' की राह में भारी निवेश की जरूरत
भारत का लक्ष्य 2070 तक नेट जीरो (Net Zero) हासिल करना है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की दरकार है। अकेले पावर सेक्टर (Power Sector) को 2070 तक $14.23 ट्रिलियन के निवेश की जरूरत पड़ सकती है। यह प्रस्तावित टैक्स रेवेन्यू का री-डायरेक्शन (Re-direction) 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता को ग्रिड से जोड़ने के लिए अहम होगा। स्टील, सीमेंट और एल्यूमीनियम जैसे 'हार्ड-टू-अबेट' सेक्टर्स भी भारत के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा हैं। भारतीय सीमेंट इंडस्ट्री का लक्ष्य 2050 तक CO2 इंटेंसिटी को 45% कम करना है, जबकि स्टील सेक्टर में 2025 तक डिमांड 8.5% बढ़ने का अनुमान है। सरकार 2032 तक पावर ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में ₹9 लाख करोड़ का निवेश करने की योजना बना रही है। दुनिया भर के देश भी ऐसे ही टैक्स री-एलोकेशन पर विचार कर रहे हैं, लेकिन भारत का मौजूदा टैक्स बेस से इतना बड़ा फंड जुटाने का प्रस्ताव अनूठा है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अतीत में क्लीन एनवायरनमेंट सेस (Clean Environment Cess) जैसे फंड्स का 60% से ज्यादा हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं हो पाया था।
सामने खड़ी चुनौतियां
इस योजना के बावजूद, कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। ₹75,166 करोड़ का अनुमानित सालाना फंड, इंडस्ट्रियल एफिशिएंसी अपग्रेड्स (₹1.32 लाख करोड़) और रिन्यूएबल ट्रांसमिशन सिस्टम (₹2.44 लाख करोड़ 2030 तक) की कुल जरूरत को पूरा करने के लिए काफी नहीं है। ऐसे में, अन्य फंडिंग स्रोतों पर निर्भरता बनी रहेगी। मौजूदा टैक्स रेवेन्यू इकोनॉमिक साइकल्स पर निर्भर करते हैं, जिससे फंड्स में अस्थिरता का खतरा है। भारत का कुल क्लाइमेट फाइनेंस गैप (Climate Finance Gap) 2070 तक $6.5 ट्रिलियन है, जिसके लिए 2070 तक कुल $22.7 ट्रिलियन कैपिटल जुटाना एक पहाड़ जैसी चुनौती है। पावर ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स में विदेशी निवेशकों की भागीदारी भी सीमित रही है। फंड्स का सही और पारदर्शी (Transparent) इस्तेमाल गवर्नेंस (Governance) पर निर्भर करेगा, ताकि अतीत की गलतियों से बचा जा सके।
भविष्य की राह
कॉर्पोरेट इंडिया (Corporate India) एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) को लेकर काफी आशावादी है, 93% कंपनियों ने लो-कार्बन सॉल्यूशंस में निवेश किया है। लेकिन, हालिया बजट में ट्रांसमिशन और एनर्जी स्टोरेज के लिए फंडिंग में संभावित कमी चिंता का विषय है। लंबे समय में, भारत को 2030 तक सालाना $160-200 बिलियन कैपिटल जुटाना होगा और उसका सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा।