वित्त मंत्रालय ने साफ किया है कि इनकम टैक्स का कोई मल्टी-लेयर्ड सिस्टम नहीं है, बल्कि यह इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 के तहत ही शासित होता है। सरचार्ज और सेस अतिरिक्त हैं, अलग लेयर नहीं।
इसके साथ ही, 22 सितंबर 2025 से लागू होने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में बड़े बदलाव किए गए हैं। अब मुख्य रूप से 5% (Merit Rate), 18% (Standard Rate) और चुनिंदा लग्जरी या 'सिन' गुड्स पर 40% (Demerit Rate) की दरें होंगी। इस सरलीकरण, खासकर जरूरी सामानों पर दरों में कमी से घरेलू खपत को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि इन GST सुधारों से वित्त वर्ष 2025-26 में रिटेल महंगाई 35 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकती है। साथ ही, सितंबर से नवंबर 2025 के बीच 25 बेसिस पॉइंट की गिरावट पहले ही देखी जा चुकी है। उम्मीद है कि इससे एफएमसीजी (FMCG) और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर में बिक्री बढ़ेगी।
GST सुधारों का एक अहम हिस्सा है व्यक्तिगत जीवन और स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर 22 सितंबर 2025 से GST को पूरी तरह माफ कर देना। इस फैसले से पॉलिसीधारकों के प्रीमियम में करीब 3% की कमी आएगी, जिससे इंश्योरेंस और भी किफायती हो जाएगा और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, बीमा कंपनियों के लिए यह एक चुनौती है क्योंकि इससे इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का नुकसान होगा, जिससे FY 2026 में उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। IRDAI इस पर पैनी नजर रखे हुए है।
ट्रेड को बढ़ावा देने और कंप्लायंस का बोझ कम करने के लिए कस्टम्स (Customs) में भी कई सुधार किए गए हैं। इसमें इलेक्ट्रॉनिक सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन (e-CoO), ड्यूटी पेमेंट के लिए इलेक्ट्रॉनिक कैश लेजर और एक्सचेंज रेट पब्लिशिंग जैसी प्रक्रियाओं का ऑटोमेशन शामिल है।
आगामी बजट 2026 के प्रस्तावों में विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करने और भारत को एक आकर्षक निवेश डेस्टिनेशन बनाने पर जोर दिया गया है। 1 अप्रैल 2026 से नया इनकम टैक्स एक्ट लागू होगा, जिसके नियम सरल होंगे। IT और GIFT सिटी जैसे क्षेत्रों के लिए टैक्स की स्थिरता पर भी ध्यान दिया गया है। कॉर्पोरेट टैक्स में, शेयर बायबैक को कैपिटल गेन के तौर पर देखा जाएगा और मिनिमम अल्टरनेट टैक्स (MAT) की दरें घटाई जा सकती हैं।
इन सुधारों के बावजूद, कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। GST दरें घटाने से होने वाले रेवेन्यू लॉस से थोड़े समय के लिए फिस्कल पर असर पड़ सकता है। इंश्योरेंस सेक्टर में ITC की कमी से मार्जिन पर दबाव होगा, जिसे कंपनियों को संभालना होगा। साथ ही, नए टैक्स स्ट्रक्चर को मौजूदा बिजनेस मॉडल में फिट करना भी एक जटिल काम हो सकता है। इन सुधारों को सफल बनाने के लिए पॉलिसी के लगातार क्रियान्वयन और स्पष्टता पर निर्भर करेगा।
