India's Fiscal Risk: टैक्स चोरी का बड़ा खेल, ग्लोबल झटके झेलना मुश्किल!

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AuthorAditya Rao|Published at:
India's Fiscal Risk: टैक्स चोरी का बड़ा खेल, ग्लोबल झटके झेलना मुश्किल!
Overview

भारत की अर्थव्यवस्था कई सालों से टैक्स कंप्लायंस (Tax Compliance) की कमी से जूझ रही है। पूर्व RBI डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन का कहना है कि इस स्ट्रक्चरल कमजोरी की वजह से देश ग्लोबल झटकों, जैसे बढ़ती एनर्जी की कीमतों, के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गया है, जो करंट अकाउंट पर दबाव डाल रहे हैं और इन्फ्लेशन (Inflation) को बढ़ा रहे हैं।

टैक्स गैप का बढ़ता खतरा

पूर्व RBI डिप्टी गवर्नर और सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के प्रेसिडेंट एमरेटस, राकेश मोहन ने बताया है कि भारत की आर्थिक ग्रोथ के बावजूद टैक्स रेवेन्यू (Tax Revenue) उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा है। पिछले करीब 15 सालों से टैक्स-टू-जीडीपी (Tax-to-GDP) रेश्यो लगभग सपाट बना हुआ है। इसका मतलब है कि टैक्स कलेक्शन जीडीपी ग्रोथ के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है। डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन भले ही बढ़ा हो, लेकिन ओवरऑल टैक्स-टू-जीडीपी रेश्यो में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। यह व्यापक स्तर पर टैक्स चोरी और रेवेन्यू लॉस की ओर इशारा करता है, खासकर इनडायरेक्ट टैक्स (Indirect Tax) जैसे जीएसटी (GST) में, जहां ग्राहक लागत कम करने के लिए बिल से बचने की कोशिश कर सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से, भारत का टैक्स रेवेन्यू जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 10.8% (मार्च 2015) तक पहुंचा था, लेकिन 2022 में यह गिरकर 6.73% पर आ गया, जो दुनिया के औसत 17.45% से काफी कम है। हालिया अनुमान बताते हैं कि यह गिरावट और तेज हुई है, जहां FY26 के लिए टैक्स बुओएंसी (Tax Buoyancy) घटकर 0.5-0.6 रह सकती है, जो पहले 1.1 थी। इससे एक बड़ा टैक्स गैप (Tax Gap) पैदा हो गया है।

बाहरी झटके बढ़ा रहे हैं मुश्किलें

टैक्स कंप्लायंस की यह समस्या एक फिस्कल वल्नरेबिलिटी (Fiscal Vulnerability) पैदा कर रही है, जो वर्तमान जियोपॉलिटिकल तनावों और ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स पर उनके प्रभाव से गंभीर रूप से परखी जा रही है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों ने क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है, ब्रेंट क्रूड $115 प्रति बैरल के पार चला गया है। भारत, जो अपने तेल का 85% से अधिक आयात करता है, के लिए यह प्राइस शॉक गंभीर आर्थिक चुनौतियां पेश कर रहा है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को $18-20 बिलियन यानी जीडीपी के करीब 0.5% तक बढ़ा सकती है। अगर क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो CAD जीडीपी के 1.3%-2.5% तक बढ़ सकता है, जिससे बाहरी फाइनेंस पर दबाव बढ़ेगा। इसके अलावा, ऊंचे तेल की कीमतों से इन्फ्लेशन (Inflation) भी बढ़ेगा; कीमतों में 10% की बढ़ोतरी भारत के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) को 40-60 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा सकती है। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का अनुमान है कि इन दबावों के कारण FY27 में भारत का इन्फ्लेशन 4.6% तक पहुंच सकता है और जीडीपी ग्रोथ घटकर 5.9% रह सकती है। पश्चिम एशिया से रेमिटेंस (Remittances) में संभावित रुकावटें बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (Balance of Payments) पर और तनाव बढ़ा सकती हैं।

स्ट्रक्चरल कमजोरी और एनफोर्समेंट गैप

टैक्स कंप्लायंस की यह अंतर्निहित समस्या एक महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करती है। टेक्नोलॉजी और स्ट्रक्चरल बदलावों के बावजूद, भारत का टैक्स रेवेन्यू कलेक्शन पर्याप्त नहीं है। डायरेक्ट टैक्स (जैसे कॉर्पोरेट और पर्सनल इनकम टैक्स) में टैक्स बुओएंसी की लगातार कमी, साथ ही कंजम्प्शन टैक्स से होने वाला महत्वपूर्ण रेवेन्यू लॉस, व्यापक एनफोर्समेंट (Enforcement) समस्याओं का संकेत देता है। वर्ल्ड बैंक (World Bank) के अनुसार, टैक्स रेट भले ही प्रतिस्पर्धी हों, लेकिन कलेक्शन एफिशिएंसी (Collection Efficiency) उतनी कुशल नहीं है जितनी हो सकती थी। इनडायरेक्ट टैक्स पर भारी निर्भरता और डायरेक्ट टैक्स बेस को पर्याप्त रूप से व्यापक बनाने में विफलता सरकार को सीमित वित्तीय लचीलापन देती है। राकेश मोहन पहले भी फिस्कल एक्सेस (Fiscal Excesses) और इन्फ्लेशन व कॉम्पिटिटिवनेस पर उनके नकारात्मक प्रभावों के खिलाफ चेतावनी दे चुके हैं। यदि ब्रेंट क्रूड $115 प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो देश का आयात बिल सालाना $56-64 बिलियन तक बढ़ सकता है, जिससे फाइनेंस पर पड़ने वाला दबाव इंटरेस्ट रेट हाइक (Interest Rate Hike) जैसे उपायों की मांग कर सकता है और मार्केट वैल्यूएशन्स (Market Valuations) को चुनौती दे सकता है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा रुपये की कमजोरी और इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन के जोखिम को सीमित करने के लिए बैंकों की नेट ओपन पोजीशन लिमिट (Net Open Position limits) पर प्रतिबंध लगाना इसी नाजुक स्थिति को दर्शाता है। वर्तमान स्थिति, जिसमें जियोपॉलिटिकल जोखिम और ऊंचे कमोडिटी प्राइसेस शामिल हैं, घरेलू रेवेन्यू कलेक्शन में सुधार और फिस्कल रेजिलिएंस (Fiscal Resilience) को मजबूत करने के लिए एक मजबूत रणनीति की मांग करती है, जैसा कि आईएमएफ (IMF) और वर्ल्ड बैंक (World Bank) द्वारा भी कहा गया है।

भविष्य की राह और पॉलिसी प्राथमिकताएं

इन चुनौतियों से निपटने के लिए, डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स दोनों धाराओं में टैक्स कंप्लायंस में सुधार के लिए एक मजबूत पॉलिसी प्रयास की आवश्यकता है, खासकर जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता कम हो जाती है। वित्तीय लेन-देन, विशेष रूप से बड़े निवेशों को ट्रैक करने के लिए एडवांस्ड डेटा एनालिटिक्स (Advanced Data Analytics) और आईटी (IT) का उपयोग, आय की सही रिपोर्टिंग और टैक्स के लिए महत्वपूर्ण है। आईएमएफ (IMF) और वर्ल्ड बैंक (World Bank) बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य पर विकास-बढ़ाने वाले खर्च के लिए वित्तीय लचीलापन बनाने की कुंजी के रूप में घरेलू रेवेन्यू मोबिलाइजेशन (Domestic Revenue Mobilization) पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की वकालत करते हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड (Standard Chartered) का विश्लेषण बताता है कि यदि इन्फ्लेशन और वैश्विक ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो लगातार ऊंचे ऊर्जा मूल्य RBI द्वारा पॉलिसी रेट हाइक (Policy Rate Hike) का कारण बन सकते हैं। भारत की करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को प्रबंधित करने, मुद्रा स्थिरता बनाए रखने और लगातार ग्रोथ को बढ़ावा देने की क्षमता, इन लंबे समय से चली आ रही कंप्लायंस गैप्स को ठीक करने और अस्थिर वैश्विक आर्थिक माहौल में अपनी रेवेन्यू जनरेशन फ्रेमवर्क को मजबूत करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करती है।

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