यह सेक्टर जहाँ एक ओर बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दे रहा है और नए उद्यमियों (Entrepreneurs) को बढ़ावा दे रहा है, वहीं इसके आंकड़े एक जटिल तस्वीर पेश करते हैं। ऊपर से देखने पर यह सेक्टर फल-फूल रहा है, लेकिन गहराई से देखें तो पता चलता है कि यह कम-वैल्यू वाले आउटपुट (Low-Value Output) और अनिश्चित कमाई पर निर्भर है, जो टिकाऊ विकास (Sustainable Growth) के लिए बड़ी चुनौती पेश करता है।
नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा जारी हालिया 'एनुअल सर्वे ऑफ अनइनकॉर्पोरेटेड सेक्टर एंटरप्राइजेज (ASUSE) 2025' के अनुसार, भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) में जबर्दस्त ग्रोथ दिखी है। इस सेक्टर ने करीब 74.5 लाख नौकरियां जोड़ीं और 2025 में इसके प्रतिष्ठानों (Establishments) की संख्या 8% बढ़कर 7.92 करोड़ हो गई। इस सेक्टर ने 12.81 करोड़ श्रमिकों को रोजगार दिया है। हालांकि, इस विस्तार पर स्थिर प्रोडक्टिविटी (Productivity) और जीवन यापन की लागत के मुकाबले पिछड़ती मजदूरी भारी पड़ रही है। इस सेक्टर में काम करने वाले हर कर्मचारी की औसत वार्षिक कमाई (Annual Emolument) ₹1.4 लाख से ₹1.5 लाख के बीच है, यानी हर महीने लगभग ₹12,000 से ₹13,000। यह आंकड़ा कई भारतीय राज्यों की न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage) की सीमा से काफी नीचे है, जो अक्सर ₹15,000 प्रति माह से ऊपर होती है। यहां तक कि केंद्र सरकार की अकुशल श्रमिकों (Unskilled Labour) के लिए तय दर भी लगभग ₹20,358 मासिक है।
प्रोडक्टिविटी की बात करें तो प्रति कर्मचारी ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA), जो आर्थिक आउटपुट का एक पैमाना है, केवल ₹1.6 लाख सालाना है। यह दिखाता है कि प्रति व्यक्ति बहुत कम वैल्यू जेनरेट हो रही है। नौकरियों के सृजन और वैल्यू जनरेशन के बीच यह बड़ा गैप बताता है कि हम एक ऐसे आर्थिक मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ 'नौकरियां ज़्यादा हैं, पर वैल्यू कम' (Job-heavy, Value-light)। यह स्थिति स्थायी आर्थिक विकास (Sustainable Economic Growth) के लिए बड़ी संरचनात्मक बाधाओं (Structural Challenges) की ओर इशारा करती है।
