सर्विसेज सेक्टर में तेज़ी, घरेलू मांग बनी मुख्य सहारा
सर्विसेज सेक्टर में अप्रैल में ज़बरदस्त ग्रोथ दर्ज की गई। सर्विसेज परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) मार्च के 57.5 से बढ़कर 58.8 पर पहुंच गया। यह पिछले 5 महीनों की सबसे तेज़ ग्रोथ रेट है और 50 के लेवल से काफी ऊपर है, जो विस्तार का संकेत देता है। इस ग्रोथ का मुख्य कारण कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग, ई-कॉमर्स का बढ़ता प्रभाव और लॉजिस्टिक्स (Logistics) व रीलोकेशन (Relocation) की बढ़ती मांग के चलते घरेलू मांग का मज़बूत होना रहा। कंज्यूमर सर्विसेज इसमें सबसे आगे रहीं, जबकि ट्रांसपोर्ट, इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन सेक्टर्स का भी अच्छा सपोर्ट मिला। कुल मिलाकर प्राइवेट सेक्टर में भी नई जान आई, और HSBC इंडिया कंपोजिट PMI मार्च के 57.0 से बढ़कर अप्रैल में 58.2 हो गया। यह मज़बूत आर्थिक विस्तार को दर्शाता है, हालांकि इसकी रफ्तार पिछले करीब ढाई सालों में सबसे धीमी रही है। अप्रैल में इंडिया की सर्विसेज ग्रोथ रेट, चीन के 52.6 PMI से भी बेहतर रही, जो घरेलू इकोनॉमी की मज़बूती को दिखाता है।
पश्चिम एशिया संकट का एक्सपोर्ट पर असर, ऑर्डर्स में आई भारी गिरावट
वहीं, दूसरी तरफ इंटरनेशनल मार्केट से इंडिया की सर्विसेज के लिए मांग में भारी गिरावट आई है। नए एक्सपोर्ट ऑर्डर (Export Orders) पिछले एक साल से भी ज़्यादा धीमी गति से बढ़े हैं। सर्वे में शामिल लोगों ने इसे सीधे तौर पर पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे संघर्ष और इनबाउंड टूरिज्म (Inbound Tourism) में आई कमी से जोड़ा है, जिसने ट्रेड रूट्स (Trade Routes) और शिपिंग को प्रभावित किया है। इस क्षेत्र की अस्थिरता के कारण एक्सपोर्टर्स के लिए शिपिंग कॉस्ट (Shipping Costs) बढ़ गई है, देरी हो रही है और अतिरिक्त चार्ज लग रहे हैं। मार्च में पश्चिम एशिया, जो इंडिया के लिए एक अहम बाज़ार है, वहां एक्सपोर्ट में 58% की गिरावट आई, जबकि यू.ए.ई. (UAE) को एक्सपोर्ट 62% तक कम हो गए। इस फाइनेंशियल ईयर 2026 में सर्विसेज एक्सपोर्ट 418.3 बिलियन डॉलर तक पहुंचे, जो 7.9% की बढ़ोतरी है, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक (Geopolitical) उठापटक नए एक्सपोर्ट ऑर्डर्स के लिए चुनौतियां खड़ी कर रही है।
इनपुट कॉस्ट (Input Costs) बढ़ीं, पर कंपनियों ने बढ़ाया लागत सोखने का दम
अप्रैल में सर्विसेज प्रोवाइडर्स को अपने ऑपरेटिंग कॉस्ट (Operating Costs) को लेकर भी परेशानी झेलनी पड़ी। खाने-पीने की चीजों, गैस और लेबर (Labor) जैसी इनपुट कॉस्ट (Input Costs) ऊंची बनी रहीं। हालांकि कुल कॉस्ट इन्फ्लेशन (Cost Inflation) पिछले महीनों की तुलना में थोड़ा कम हुआ, लेकिन यह हाल के उच्चतम स्तरों के करीब रहा। खास बात यह है कि कंपनियों ने इन बढ़ी हुई लागतों का बड़ा हिस्सा खुद ही सोख लिया और ग्राहकों पर इसका बोझ बहुत कम डाला। इसके चलते आउटपुट प्राइस (Output Price) में बढ़ोतरी एक तीन महीने के निचले स्तर पर आ गई। यह रणनीति ग्राहकों की मांग को बनाए रखने में मदद कर सकती है, लेकिन यह कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) पर दबाव डाल रही है, खासकर अगर इनपुट कॉस्ट बढ़ती रहती हैं और कीमतों में वैसी बढ़ोतरी नहीं होती। इंडिया के ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में सर्विसेज सेक्टर का योगदान लगभग 55% है, इसलिए स्थिर मार्जिन इकोनॉमी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
हायरिंग (Hiring) बढ़ी, पर भविष्य को लेकर चिंताएं कायम
नए फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत के साथ ही हायरिंग एक्टिविटी (Hiring Activity) में भी बढ़ोतरी हुई। बढ़ते बिजनेस वॉल्यूम (Business Volumes) को संभालने के लिए कंपनियों ने ज़्यादा स्टाफ रखा। सर्विसेज सेक्टर में एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ (Employment Growth) पिछले 10 महीनों में सबसे तेज़ रही। हालांकि, इस हायरिंग बूस्ट और मज़बूत घरेलू मांग के बावजूद, अगले 12 महीनों के लिए बिजनेस कॉन्फिडेंस (Business Confidence) मार्च की तुलना में कमज़ोर पड़ा। ऑप्टिमिज़्म (Optimism) में आई यह गिरावट मुख्य रूप से पश्चिम एशिया संकट और लगातार बनी हुई कॉस्ट प्रेशर (Cost Pressures) को लेकर चिंताओं के कारण थी। यह दर्शाता है कि बाहरी अनिश्चितताओं और महंगाई को देखते हुए मौजूदा ग्रोथ को बनाए रखने को लेकर कुछ सावधानी बरती जा रही है।
