राज्यों पर बढ़ी जिम्मेदारियां, केंद्र का योगदान घटा
नए 'Viksit Bharat Act' के तहत, जो 1 जुलाई, 2025 से लागू होगा, राज्यों पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ने वाला है। सबसे अहम बदलाव यह है कि अब अनइंप्लॉयमेंट अलाउंस (unemployment allowance) का पूरा खर्च राज्य सरकारें सीधे वहन करेंगी। यह MGNREGA से एक बड़ा प्रस्थान है।
इसके अलावा, कार्यक्रम के खर्चों के बंटवारे में भी संशोधन किया गया है। जहां पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों को अधिक केंद्रीय सहायता मिलेगी, वहीं बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) का पूरा खर्च केंद्र उठाएगा। लेकिन सामान्य इलाकों में, केंद्र सरकार का फंडिंग योगदान 90% से घटकर 60% रह जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि राज्यों को कार्यक्रम के खर्चों का एक बड़ा हिस्सा खुद वहन करना पड़ेगा। जानकारों का मानना है कि इससे राज्यों के बजट पर दबाव आ सकता है और वे नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देने में कटौती कर सकते हैं, जिससे रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं।
काम के दिनों से आगे, ग्रामीण विकास पर फोकस
'Viksit Bharat Act' का दायरा सिर्फ रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह व्यापक ग्रामीण विकास योजना (rural development planning) को भी कवर करेगा। प्रोजेक्ट्स को Viksit Gram Panchayat Plans (VGPPs) के माध्यम से प्लान किया जाएगा और इन्हें पानी की सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, लाइवलीहुड्स और क्लाइमेट रेजिलिएंस जैसी श्रेणियों में फिट होना होगा।
इस कानून का उद्देश्य इसे अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ना भी है। साथ ही, खेतों में श्रमिकों की कमी को पूरा करने में मदद के लिए व्यस्त खेती के समय रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। सरकार का जोर स्थायी ग्रामीण संपत्ति (lasting rural assets) बनाने पर है, जो 'Viksit Bharat 2047' के विजन के अनुरूप है। इसके कार्यान्वयन के लिए सख्त डिजिटल अटेंडेंस (digital attendance), अधिक ट्रांसपेरेंसी (transparency), पब्लिक डिस्क्लोजर्स (public disclosures) और वर्कसाइट पर सूचना बोर्ड जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाएगा।
अधिकारों को लेकर चिंता और संघीय ढांचे पर सवाल
इस कानून के पारित होने के दौरान आलोचनाएं भी हुईं, कुछ लोगों ने लेजिस्लेटिव प्रोसेस (legislative process) को जल्दबाजी में लाया गया बताया। आलोचकों, जिनमें विपक्षी दल (Opposition parties) और पॉलिसी एनालिस्ट्स (policy analysts) शामिल हैं, का मानना है कि ये सुधार 'काम के अधिकार' (right to work) को कमजोर कर सकते हैं।
उनका तर्क है कि एक ओपन-एंडेड, डिमांड-ड्रिवन (demand-driven) प्रोग्राम से एक अधिक नियंत्रित व्यवस्था की ओर बढ़ने से इसका मुख्य बल कम हो जाता है। कुछ चिंताएं इस बात को लेकर भी हैं कि यूनियन सरकार (Union government) शक्ति का केंद्रीकरण कर रही है और भारत के फेडरल सिस्टम (federal system) को कमजोर कर रही है, क्योंकि राज्यों को नियंत्रण के मुकाबले बड़ी वित्तीय जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। MGNREGA में पहले से ही अंडरफंडिंग (underfunding) और पेमेंट डिले (payment delays) जैसी समस्याएं थीं, जो राज्यों द्वारा अधिक फंडिंग जिम्मेदारी संभालने पर और बढ़ सकती हैं।
सरकार का कहना है कि ये बदलाव MGNREGA की खामियों को दूर करेंगे और 'Viksit Bharat 2047' के बेहतर योजना और दक्षता के लक्ष्यों के साथ बेहतर तालमेल बिठाएंगे। हालांकि, MGNREGA ने ग्रामीण गरीबी कम करने, आय बढ़ाने और समुदायों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके राइट्स-बेस्ड (rights-based), डिमांड-ड्रिवन (demand-driven) दृष्टिकोण से हटने से ये फायदे खतरे में पड़ सकते हैं, खासकर यदि राज्य नई फंडिंग मांगों को संभालने में संघर्ष करते हैं। आर्थिक प्रभाव में ग्रामीण खर्च, महंगाई और समग्र स्थिरता पर असर शामिल हो सकता है, जहां MGNREGA ने पहले एक बफर (buffer) प्रदान किया था। 'Viksit Bharat Act' की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य कार्यक्रम के व्यापक लक्ष्यों को पूरा करते हुए उच्च लागतों को कैसे संभालते हैं, जो भारत के बदलते फिस्कल बैलेंस (fiscal balance) का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
