तेल के दाम आसमान पर, रुपया क्यों गिरा?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान से जुड़े संघर्ष के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें करीब $105.66 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो पिछले एक महीने में 35.97% की जबरदस्त बढ़ोतरी है। भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा तेल आयात करता है, इसलिए तेल के दाम बढ़ने का सीधा असर देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) पर पड़ता है और इंपोर्ट बिल (Import Bill) बढ़ जाता है। इसी का नतीजा है कि रुपया 93.47 के निचले स्तर को छू गया है।
पड़ोसियों से पिछड़ रहा रुपया, महंगाई का डर
यह चिंता की बात है कि जहां 2026 की शुरुआत में कई एशियाई करेंसी (Asian Currencies) मजबूत हुईं, वहीं भारतीय रुपया पिछड़ गया। पिछले एक साल में जहां मलेशियाई रिंगित 12% और चीनी युआन 5.61% मजबूत हुए, वहीं रुपये में करीब 5% की गिरावट आई। अक्टूबर-दिसंबर 2025-26 तिमाही में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़कर $13.2 बिलियन यानी जीडीपी का 1.3% हो गया, जो पिछले साल 1.1% था। महंगाई (Inflation) भी बढ़ रही है, कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) फरवरी 2026 में 3.21% पर पहुंच गया है, और तेल की कीमतों के साथ इसके और बढ़ने की उम्मीद है।
विदेशी निवेशक बेच रहे भारतीय शेयर, RBI की चुनौती
इन सब वजहों से फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) भी घबराए हुए हैं। मार्च 2026 में उन्होंने भारतीय इक्विटी (Equity) से रिकॉर्ड $12.3 बिलियन की भारी निकासी की है। यह दिखाता है कि विदेशी निवेशक फिलहाल भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) में पैसा लगाने से हिचकिचा रहे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि रुपया को संभालने के लिए उसे विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का इस्तेमाल करना पड़ता है, जो कि सीमित है। RBI की इंटरवेंशन (Intervention) स्ट्रैटेजी सिर्फ वोलेटिलिटी (Volatility) को कंट्रोल करने पर है, न कि किसी खास रेट को टारगेट करने पर, ऐसे में ये दबाव झेलना मुश्किल हो सकता है।