रुपये पर आई रिकॉर्ड गिरावट, तेल के दामों ने बिगाड़ा खेल
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 82 पैसे गिरकर 95.31 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया। इस भारी गिरावट का सीधा संबंध पश्चिम एशिया में बढ़ी भू-राजनीतिक अस्थिरता से है। इन तनावों के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $104.82 प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश होने के नाते, बढ़ती कीमतों के इस झटके से सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। इसके अलावा, US Dollar Index (DXY) भी लगभग 97.9845 के स्तर पर बना हुआ है, जिसने रुपये जैसी उभरती बाज़ार की मुद्राओं के मुकाबले डॉलर को और मजबूत कर दिया है।
विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सरकार की कंजूसी की अपील
बाहरी दबाव से निपटने के लिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से फिजूलखर्ची कम करने का आह्वान किया है। नागरिकों से सोने की खरीद फिलहाल टालने, ईंधन की खपत घटाने और विदेशी यात्राएं सीमित करने का आग्रह किया गया है। इन उपायों का मुख्य उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को बचाना और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित करना है। गौर हो कि सोने का आयात भारत का तेल के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयात है, जो फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में $58 अरब तक पहुंच गया था। यह कदम उच्च कच्चे तेल की कीमतों के कारण बढ़े चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को नियंत्रित करने की एक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, यह उपाय आर्थिक गतिविधियों में कुछ हद तक सुस्ती का संकेत भी देते हैं।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाई मुसीबत
विदेशी निवेशकों (Foreign Investors) ने भारतीय शेयर बाजारों (Equities) से पैसा निकालना जारी रखा है, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ा है। शुक्रवार को ही फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने ₹4,110.60 करोड़ के शेयर बेचे। साल 2026 की शुरुआत से अब तक, FIIs भारतीय इक्विटी से करीब $22 अरब निकाल चुके हैं, जो पिछले दो दशकों में सबसे बड़ी निकासी में से एक है। इसके चलते भारतीय शेयर बाजार में विदेशी हिस्सेदारी 14 साल के निचले स्तर पर आ गई है। यह रुझान बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के बीच सुरक्षित संपत्तियों (Safer Assets) की ओर झुकाव को दर्शाता है। नतीजतन, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी काफी कम हुआ है, जो 1 मई, 2026 को समाप्त सप्ताह में $7.794 अरब घटकर $690.693 अरब रह गया। फरवरी 2026 में यह भंडार $728.494 अरब के शिखर पर था।
आर्थिक जोखिम और भविष्य का अनुमान
इन सभी दबावों का भारत की आर्थिक स्थिरता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। पिछले एक साल में रुपये में लगभग 12.00% की बड़ी गिरावट देखी गई है, और यह ऐतिहासिक रूप से भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाले तेल आयात पर भारत की भारी निर्भरता इसे आपूर्ति में बाधा और कीमतों में अचानक वृद्धि के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। उच्च तेल और सोने के आयात बिलों के कारण बढ़ता चालू खाता घाटा, रुपये पर लगातार दबाव बनाए रखेगा और विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर सकता है। हालांकि डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने कुछ FII की बिकवाली को संभाला है, लेकिन वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (Global Risk Aversion) एक प्रमुख कारक बनी रहेगी। विश्लेषकों का अनुमान है कि निकट भविष्य में रुपया 94.75 से 95.50 के बीच कारोबार कर सकता है, और 2026 के अंत तक USD/INR एक्सचेंज रेट 98.3904 के आसपास पहुंचने का अनुमान है। जब तक वैश्विक अनिश्चितता कम नहीं होती और कंपनियों की कमाई (Corporate Earnings) में सुधार नहीं होता, तब तक विदेशी पूंजी का प्रवाह (Foreign Capital Inflows) सुस्त रहने की उम्मीद है।
