रुपये की मजबूती के पीछे क्या है?
Goldman Sachs के एनालिस्ट्स का कहना है कि भारतीय रुपया इस समय 'अच्छी जगह' पर है। देश की डोमेस्टिक मैक्रोइकॉनॉमिक्स (macroeconomics) में सुधार और इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) की बढ़ती रेजिलिएंस (resilience) इसके पीछे मुख्य कारण हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रुपया ट्रेड-वेटेड बेसिस पर थोड़ा अंडरवैल्यूड (modestly undervalued) है, जिसका मतलब है कि इसमें बड़ी गिरावट की उम्मीद कम है। इमर्जिंग मार्केट्स अब ग्लोबल वोलेटिलिटी (volatility) को बेहतर ढंग से झेलने की स्थिति में हैं, क्योंकि उनकी मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) और फिस्कल मैनेजमेंट (fiscal management) पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। भारत के फिस्कल कंसॉलिडेशन (fiscal consolidation) और इन्फ्लेशन टारगेटिंग (inflation targeting) के प्रयासों ने करेंसी मार्केट में विश्वास बढ़ाया है।
IT एक्सपोर्ट्स पर AI का मिला-जुला असर
दूसरी ओर, भारत के IT एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का असर मिला-जुला रहने की उम्मीद है। AI से प्रोडक्टिविटी (productivity) बढ़ने की संभावना है, जिससे कंपनियों का रेवेन्यू (revenue) बढ़ सकता है। हालांकि, इससे जॉब मार्केट (job market) में बड़े बदलाव आ सकते हैं, क्योंकि AI कुछ कामों को ऑटोमेट (automate) कर सकता है। इसके बावजूद, एनालिस्ट्स का मानना है कि IT कंपनियों का रेवेन्यू बढ़ता रहेगा, भले ही वर्कफोर्स (workforce) में कुछ एडजस्टमेंट (adjustments) हों।
बॉन्ड यील्ड्स और ग्लोबल करेंसी की चाल
Goldman Sachs का अनुमान है कि भारत का 10-साल का सरकारी बॉन्ड यील्ड (10-year government bond yield) मीडियम-टर्म में करीब 6.5% के स्तर पर आ सकता है। फिलहाल यील्ड्स ऊंचे स्तर पर हैं, लेकिन महंगाई कम होने और डिपॉजिट री-प्राइसिंग (deposit repricing) के साथ इनमें धीरे-धीरे गिरावट की उम्मीद है। ग्लोबल लेवल पर, अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के कमजोर होने का अनुमान है, क्योंकि ग्लोबल ग्रोथ (global growth) में संतुलन आ रहा है और फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) ब्याज दरें घटा सकता है। साथ ही, चीन का रेन्मिम्बी (Renminbi) भी धीरे-धीरे मजबूत हो सकता है, जिससे भारतीय रुपये पर सीधा कम्पटीशन (competition) कम होगा।
छिपे हुए खतरे और जोखिम
हालांकि, इन सबके बीच कुछ खतरे भी बने हुए हैं। डॉलर के कमजोर होने से दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी पर दबाव बढ़ सकता है, अगर वे तालमेल नहीं बिठा पाए। AI के कारण IT सेक्टर में बड़े पैमाने पर री-स्किलिंग (re-skilling) और एडॉप्टेशन (adaptation) की जरूरत होगी, जिसका खर्चा ज्यादा हो सकता है। अगर इस ट्रांजिशन (transition) को ठीक से मैनेज नहीं किया गया, तो यह सोशल फ्रिक्शन (social friction) या धीमी ग्रोथ का कारण बन सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट में बढ़ी हुई एसेट वैल्यूएशन्स (asset valuations) भी वोलेटिलिटी (volatility) का खतरा बढ़ाती हैं, जो इमर्जिंग मार्केट्स पर भारी पड़ सकती है।
आगे का नज़रिया
Goldman Sachs का मानना है कि आगे चलकर ग्लोबल ग्रोथ जारी रहेगी और महंगाई कम होगी, लेकिन एसेट वैल्यूएशन्स को देखते हुए मार्केट में उतार-चढ़ाव की गुंजाइश बनी रहेगी। डॉलर के कमजोर होने का ट्रेंड इमर्जिंग मार्केट्स के लिए सपोर्टिव रहेगा। भारत के लिए, IT सेक्टर में AI का रोल और ग्लोबल करेंसी की चालें आने वाले समय में इकोनॉमिक परफॉरमेंस (economic performance) तय करेंगी।