भू-राजनीतिक तनाव और तेल की महंगाई से रुपया बेहाल
दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष, ने कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। इसी का सीधा असर भारतीय रुपये पर दिख रहा है, जो रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। तेल की बढ़ी हुई कीमतें भारत की पहले से मौजूद आर्थिक कमजोरियों को और बढ़ा रही हैं, जैसे कि आयात पर भारी निर्भरता और चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit)।
रुपये पर भारी दबाव
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया रिकॉर्ड गिरावट पर है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। आयातित कच्चे तेल की लागत बढ़ने से भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ रहा है और चालू खाते के संतुलन पर भारी दबाव आ रहा है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 तक भारत का चालू खाते का घाटा बढ़कर जीडीपी का 2.3% हो सकता है, जो वित्त वर्ष 2026 में 0.9% था। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों के झटके
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का उस पर गहरा असर पड़ता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने से कंपनियों के लिए लागत बढ़ जाती है, आम आदमी की खर्च करने की क्षमता कम हो जाती है और आर्थिक विकास धीमा पड़ सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में $10 की बढ़ोतरी भारत की जीडीपी ग्रोथ को 0.44% तक कम कर सकती है। तेल आयात पर बढ़े खर्च से व्यापार घाटा बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
RBI की स्थिरता की कोशिशें
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये को स्थिर करने के लिए कई उपायों पर विचार कर रहा है। इसमें संभावित रूप से ब्याज दरें बढ़ाना, करेंसी स्वैप ऑपरेशनों का विस्तार करना और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से डॉलर फंड आकर्षित करना शामिल है। रुपये के डॉलर के मुकाबले 97 के करीब पहुंचने के बाद RBI के वरिष्ठ अधिकारियों ने इन रणनीतियों पर चर्चा के लिए कई बैठकें की हैं। केंद्रीय बैंक ने $5 अरब के डॉलर-रुपया स्वैप नीलामी की घोषणा की है और विदेशी मुद्रा गैर-निवासी भारतीयों (NRIs) से आकर्षित करने के लिए $50 अरब तक के इनफ्लो का लक्ष्य रखने वाले कार्यक्रमों पर भी काम कर रहा है।
आगे की आर्थिक चुनौतियाँ
पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और उसके कारण तेल की कीमतों में वृद्धि भारत के लिए बड़ी आर्थिक चुनौतियाँ पेश कर रही है। यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो चालू खाते का घाटा और बढ़ सकता है और महंगाई भी बढ़ सकती है। IMF ने चेतावनी दी है कि यदि संघर्ष तेज होता है तो भारत वैश्विक मंदी का सामना कर सकता है। इसके अलावा, रुपये में गिरावट से सभी आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ जाती है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है और लोगों की क्रय शक्ति कम हो सकती है। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 के बाकी हिस्सों में USD/INR 95-100 के बीच कारोबार करेगा, जिसका मुख्य कारण उभरते बाजारों से पूंजी का बहिर्वाह और भारत का चालू खाते का घाटा है।
आगे क्या?
हालांकि मुद्रा को स्थिर करना तात्कालिक प्राथमिकता है, सरकार नागरिकों से आयातित वस्तुओं पर निर्भरता कम करने का आग्रह कर रही है। अमेरिकी व्यापार अधिकारियों के साथ आगामी चर्चाएं और खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council) के साथ मुक्त व्यापार समझौते के लिए चल रही बातचीत भविष्य के आर्थिक संबंधों के लिए संभावित रास्ते खोल सकती हैं। हालांकि, समग्र आर्थिक दृष्टिकोण भू-राजनीतिक तनावों के समाधान और वैश्विक तेल की कीमतों व व्यापार पर उनके प्रभाव पर निर्भर करेगा।
