ग्लोबल ट्रेंड्स और पेमेंट सिस्टम में बदलाव
यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब डी-डॉलराइजेशन (de-dollarization) यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। IMF के आंकड़ों के मुताबिक, भू-राजनीतिक बदलावों और आर्थिक पुनर्गठन के चलते ग्लोबल रिजर्व (global reserves) में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 2017 के ६४% से घटकर Q4 2025 तक ५६.७% रह गई है। वहीं, 'अन्य मुद्राओं' और सोने के भंडार में बढ़ोतरी देखी गई है। SWIFT के दबदबे का जवाब देने के लिए चीन के CIPS और रूस के SPFS जैसे अल्टरनेटिव पेमेंट सिस्टम (alternative payment systems) का विस्तार हो रहा है। BRICS Pay पहल अभी शुरुआती दौर में है और सदस्य देशों के बीच रेगुलेटरी और टेक्निकल बाधाओं से जूझ रही है। इन विकल्पों के बावजूद, दिसंबर 2025 में SWIFT के जरिए अंतरराष्ट्रीय पेमेंट्स में डॉलर की हिस्सेदारी करीब ५०.५% पर मजबूत बनी हुई है। चीन के युआन (RMB) ने भी प्रगति की है, जो सितंबर 2025 तक ग्लोबल पेमेंट्स का ३.१७% हिस्सा था और 2026 की शुरुआत में चीन के करीब ३०% ट्रेड को सेटल कर रहा था।
रुपया एडॉप्शन (Adoption) की मुख्य चुनौतियां
भारत ने 30 देशों के 123 विदेशी बैंकों के साथ १५६ स्पेशल रुपया वोस्ट्रो अकाउंट्स (Vostro accounts) स्थापित किए हैं, लेकिन असल क्रॉस-बॉर्डर सेटलमेंट (cross-border settlement) अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। रुपये में इनवॉइसिंग और सेटलमेंट के बीच लगातार बनी खाई यह बताती है कि अहम ट्रांजैक्शंस के लिए रुपये की प्रैक्टिकल यूटिलिटी (practical utility) और भरोसे को बढ़ाने की जरूरत है। रुपये की एक्सचेंज रेट में अस्थिरता (volatility) और कैपिटल अकाउंट (capital account) पर इसकी आंशिक कन्वर्टिबिलिटी (partial convertibility) विदेशी ट्रेडर्स और निवेशकों को चिंतित कर सकती है। भारत की ग्लोबल एक्सपोर्ट्स (global exports) में महज २% की हिस्सेदारी भी रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने में उसकी ताकत को सीमित करती है। भारत का लक्ष्य डॉलर को पूरी तरह से बदलना नहीं है, बल्कि रुपये को एक व्यापक मल्टी-करेंसी स्ट्रेटेजी (multi-currency strategy) के हिस्से के रूप में स्थापित करना है, जो एक मापा हुआ, लेकिन फिर भी चुनौतीपूर्ण रास्ता दिखाता है।
आगे का रास्ता
रुपये के इंटरनेशनललाइजेशन (internationalization) का भविष्य बदलते ग्लोबल पेमेंट सिस्टम और रणनीतिक आर्थिक नीतियों पर टिका है। CIPS और SPFS जैसे प्लेटफॉर्म्स में प्रगति, साथ ही सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDCs) जैसे मल्टी-कंट्री प्रोजेक्ट mBridge, लोकल करेंसी सेटलमेंट के लिए अधिक कुशल चैनल बना सकते हैं। भारत की सफलता घरेलू सुधारों (domestic reforms), एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव को संभालने और इस मल्टीपोलर फाइनेंशियल लैंडस्केप (multipolar financial landscape) के भीतर कैपिटल फ्लोज़ (capital flows) को प्रभावी ढंग से मैनेज करने पर निर्भर करेगी।