ग्लोबल मार्केट से मिले मिले-जुले संकेतों और कच्चे तेल की कीमतों में हलचल के बीच, भारतीय रुपया आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोरी के साथ खुला। 91.94 के स्तर पर कारोबार कर रहा रुपया, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितताओं से जूझ रहा है।
इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 4 अरब डॉलर की निकासी की है। वहीं, मार्च के पहले हफ्ते में ही यह आंकड़ा करीब 21,000 करोड़ रुपये यानी 2.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। यह बिकवाली खासकर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण हुई है, जिससे निवेशक सतर्क हो गए हैं।
भले ही ब्रेंट क्रूड (Brent crude) 120 डॉलर प्रति बैरल के अपने हालिया शिखर से गिरकर करीब 88 डॉलर पर आ गया हो, लेकिन रुपया अभी भी बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील है। विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल करीब 16,000 करोड़ रुपये बढ़ सकता है और ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) 0.35%-0.5% तक बढ़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, जो डॉलर की मांग बढ़ाता है और रुपये पर दबाव डालता है।
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए सक्रिय रूप से दखल दे रहा है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच यह कितना प्रभावी होगा, यह देखना बाकी है। MUFG के एनालिस्ट्स ने 2026 के लिए रुपये पर नकारात्मक आउटलुक जताया है, जिसका मुख्य कारण सरकार की धीमी फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) प्रगति और बढ़ते कर्ज की जरूरत है। वहीं, Société Générale का मानना है कि USD/INR 92.00 के स्तर को फिर से छू सकता है, खासकर अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है। ING Bank ने साल के अंत 2026 तक रुपये के 87.00 के स्तर तक मजबूत होने का अनुमान लगाया है।
बाजार की मौजूदा घबराहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि iShares MSCI इमर्जिंग मार्केट्स ETF (EEM) में मार्च के पहले हफ्ते में 8.41% की भारी गिरावट देखी गई थी। भारत के Nifty 50 का फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो लगभग 21-22x के आसपास है, जो कुछ विश्लेषकों को उच्च मूल्यांकन (High Valuations) की ओर इशारा करता है, जो ऐसी आर्थिक चुनौतियों के प्रति संवेदनशील हो सकता है।