रुपये की मजबूती के पीछे छुपी अस्थिरता
मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीदों के चलते भारतीय रुपये में डॉलर के मुकाबले कुछ मजबूती आई है। ईरान से सप्लाई को लेकर सकारात्मक संकेत तेल पर निर्भर करेंसी के लिए कुछ राहत लाए हैं, लेकिन रुपये की असली स्थिरता रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के बड़े फॉरेन एक्सचेंज इंटरवेंशन पर टिकी है। RBI अपने फॉरेन रिजर्व का इस्तेमाल करके रुपये को एक सीमित दायरे में बनाए हुए है, जो मार्केट की शक्तियों के बजाय ब्याज दरों के अंतर से तय होता है।
लॉन्ग-टर्म बॉन्ड की चुनौती
फिक्स्ड इनकम मार्केट में मौजूदा बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) और भविष्य की महंगाई की उम्मीदों के बीच एक बड़ी खाई दिख रही है। 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड से अब पहले जैसा भरोसा नहीं रहा। पिछले सालों के विपरीत, सरकार के भारी खर्च को संभालने के लिए RBI के पास कोई अतिरिक्त सरप्लस नहीं है। सब्सिडी का भारी बोझ जारी रहने से सरकार की उधारी योजनाओं के सामने एक बड़ी संरचनात्मक समस्या खड़ी हो गई है। निवेशक लंबे समय तक बॉन्ड रखने के लिए ज्यादा रिटर्न की मांग कर रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अगर आने वाली मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग (Monetary Policy Meeting) नरम रुख नहीं अपनाती है, तो यील्ड में हालिया उतार-चढ़ाव स्थायी वृद्धि का कारण बन सकता है।
संरचनात्मक जोखिम और सरकारी खजाने की स्थिति
डेट मार्केट (Debt Market) पर फोकस करने वाली वित्तीय संस्थाएं 10-साल के बेंचमार्क के मुकाबले शॉर्ट-टर्म निवेश को प्राथमिकता दे रही हैं। अगर घरेलू महंगाई की उम्मीदें और बिगड़ती हैं, तो RBI को ऐसे रक्षात्मक कदम उठाने पड़ सकते हैं जो निवेश की रणनीतियों को नुकसान पहुंचाएं। अन्य उभरते बाजारों के विपरीत, जिन्होंने अपनी करेंसी को बचाने के लिए अपनी नीतियां सख्त की हैं, भारत का रुख प्रतिक्रियाशील लगता है। यह रणनीति बॉन्ड मार्केट को अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury Yield) बढ़ने पर अचानक गिरावट के प्रति संवेदनशील बनाती है, क्योंकि पिछले दो तिमाहियों में वैश्विक अनिश्चितता के कारण भारतीय बॉन्ड से लगातार पैसा बाहर जा रहा है।
भविष्य का कैपिटल फ्लो (Capital Flow)
भारत के कैपिटल मार्केट (Capital Market) का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि विदेशी निवेशक मौजूदा यील्ड को एक अवसर के रूप में देखते हैं या जाल के रूप में। विश्लेषकों का कहना है कि जब तक सरकार, खासकर एनर्जी सब्सिडी को लेकर, फिस्कल सुधार की अपनी योजना स्पष्ट नहीं करती, तब तक लॉन्ग-टर्म बॉन्ड दबाव में रहेंगे। अगर आने वाले पॉलिसी फैसले में अप्रत्याशित ब्याज दर वृद्धि (Interest Rate Hike) शामिल होती है, तो यील्ड कर्व (Yield Curve) तेजी से फ्लैट हो जाएगा, क्योंकि करेंसी को स्थिर करने के प्रयासों पर मार्केट लिक्विडिटी (Market Liquidity) की चिंताएं हावी हो सकती हैं।
