फिस्कल कंसॉलिडेशन की राह पर बड़ा कदम
आगामी फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए सरकार की फिस्कल रणनीति का मुख्य आकर्षण ₹80,000 करोड़ का डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट है। यह रकम मिसलेनियस कैपिटल रिसीट्स (Miscellaneous Capital Receipts) के जरिए जुटाई जाएगी, जो सरकार के रेवेन्यू को बढ़ाने और फिस्कल कंसॉलिडेशन (Fiscal Consolidation) को मजबूत करने के उसके इरादे को दर्शाती है। यह लक्ष्य मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के ₹34,169 करोड़ के रिवाइज्ड एस्टिमेट के मुकाबले एक बड़ी छलांग है। इससे पता चलता है कि सरकार मार्केट की मौजूदा स्थिति और एसेट बिक्री को अंजाम देने की अपनी क्षमता को लेकर काफी आशावादी है।
इरादों और हकीकत के बीच का अंतर
पिछले फाइनेंशियल इयर्स में डिसइन्वेस्टमेंट के लक्ष्य को हासिल करने में सरकार को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। चालू फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए, सरकार ने शुरुआत में ₹47,000 करोड़ का बजट रखा था, लेकिन कलेक्शन धीमा रहने के कारण इसे घटाकर ₹34,169 करोड़ करना पड़ा। इससे पिछले फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में तो स्थिति और भी खराब थी, जब डिसइन्वेस्टमेंट से सिर्फ ₹20,214 करोड़ ही हासिल हुए थे। एनालिस्ट्स का कहना है कि FY26 में अब तक डिसइन्वेस्टमेंट से होने वाली कमाई उम्मीदों से काफी कम है, और इसमें Mazagon Dock Shipbuilders जैसी कंपनियों में छोटे स्टेक की बिक्री का ही योगदान रहा है। इन ऐतिहासिक आंकड़ों को देखते हुए ₹80,000 करोड़ के लक्ष्य को सिर्फ घोषणाओं से पूरा करना मुश्किल लग रहा है।
स्ट्रेटेजिक रिफॉर्म्स और एसेट मोनेटाइजेशन
सरकार की रणनीति सिर्फ शेयर बेचने तक सीमित नहीं है। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में 'गवर्नमेंट कंपनी' की परिभाषा को बदलने का सुझाव दिया गया है, जिससे लिस्टेड पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) में सरकार की हिस्सेदारी कम करके 26% तक की जा सकती है, जबकि कंट्रोल सरकार के पास ही रहेगा। इसका मकसद पब्लिक सेक्टर कंपनियों से ज्यादा वैल्यू निकालना और नॉन-डेट कैपिटल रिसीट्स (Non-debt Capital Receipts) को बढ़ाना है। ₹80,000 करोड़ के टारगेट में एसेट मोनेटाइजेशन (Asset Monetisation) से होने वाली कमाई भी शामिल है। इसमें सड़कें, रेलवे, पावर ट्रांसमिशन और टेलीकॉम नेटवर्क जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। IDBI Bank जैसे बड़े स्टेक की बिक्री, जो FY26 में अटकी हुई थी, अब बजट के बाद वित्तीय बोलियों (Financial Bids) के लिए आगे बढ़ रही है, जिससे अगर यह डील पूरी हो जाती है तो इसमें बड़ी रकम मिल सकती है।
मार्केट का सतर्क रुख
हालांकि, डिसइन्वेस्टमेंट का यह बढ़ा हुआ लक्ष्य सरकार की फिस्कल डिसिप्लिन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, लेकिन मार्केट पार्टिसिपेंट्स थोड़ा सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। उनका कहना है कि इस टारगेट को हासिल करना सिर्फ घोषणाओं पर नहीं, बल्कि तय समय पर और कुशलता से योजनाओं को लागू करने और मार्केट की अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। पिछले सालों में लक्ष्यों को पूरा न कर पाना इस बात की याद दिलाता है कि बड़े पैमाने पर डिसइन्वेस्टमेंट और एसेट मोनेटाइजेशन के प्रयासों में काफी जटिलताएं शामिल होती हैं।