रिटेल निवेशकों का मोहभंग! India में Active Demat Accounts में भारी गिरावट, बाज़ार में बढ़ी चिंता

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
रिटेल निवेशकों का मोहभंग! India में Active Demat Accounts में भारी गिरावट, बाज़ार में बढ़ी चिंता
Overview

भारतीय शेयर बाज़ार में रिटेल निवेशकों की सक्रियता पर ब्रेक लग गया है। नए आंकड़ों के मुताबिक, एक्टिव Demat Accounts की संख्या में भारी गिरावट आई है, जो कि महामारी के बाद देखे गए उछाल के बिल्कुल उलट है।

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बाज़ार में रिटेल निवेशकों की घटती रुचि

महामारी के बाद भारत में इक्विटी बाज़ार में रिटेल निवेशकों की भागीदारी में एक बड़ा ठहराव देखा जा रहा है। जनवरी 2026 तक, करीब 4.51 करोड़ Demat Accounts ही एक्टिव थे, जो कि उस दौर से बिल्कुल अलग है जब लाखों लोग बाज़ार से जुड़े थे। यह गिरावट दर्शाती है कि व्यक्तिगत निवेशक अब जोखिम को लेकर ज़्यादा सतर्क हो गए हैं। कई निवेशक जो बाज़ार के ऊपरी स्तरों पर या उसके करीब आए थे, उन्हें बाज़ार की वोलैटिलिटी और खास तौर पर डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब नए अकाउंट खुलने की रफ़्तार कुछ सुधरी है, लेकिन सक्रिय भागीदारी में कमी एक चिंताजनक संकेत है।

निवेशकों के पीछे हटने की वजहें

कम ब्याज दरों और डिजिटल पहुंच में आसानी से प्रेरित होकर इक्विटी में निवेश का जो उत्साह महामारी के बाद देखा गया था, वह अब कमज़ोर पड़ गया है। रिटेल निवेशक, जिनमें युवा पीढ़ी (Gen-Z और Millennials) की बड़ी संख्या थी, अब बाज़ार के चुनौतीपूर्ण माहौल का सामना कर रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि रिटेल ट्रेडर्स को अकेले फाइनेंशियल ईयर 2025 में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग से करीब ₹1.05 लाख करोड़ का नुकसान हुआ, जिसमें 90% से ज़्यादा पार्टिसिपेंट्स को घाटा हुआ। इसके अलावा, 2025 में भारतीय बेंचमार्क के वैश्विक साथियों के मुकाबले कमज़ोर प्रदर्शन, कंपनियों के नतीजों के मुकाबले शेयरों के ऊंचे वैल्यूएशन (Valuation) की चिंताएं, और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने भी निवेशकों का सेंटिमेंट (Sentiment) खराब किया है। प्राइमरी मार्केट (Primary Market) में भी कई नए IPOs के खराब लिस्टिंग प्रदर्शन ने निवेशकों को और सतर्क कर दिया है।

बाज़ार की बदलती तस्वीर और DIIs का बढ़ता दबदबा

रिटेल भागीदारी में इस बदलाव से भारत के कैपिटल मार्केट्स (Capital Markets) की तस्वीर बदल रही है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) अब बाज़ार में हावी हो गए हैं। चौथी तिमाही फाइनेंशियल ईयर 2025 में Nifty-500 कंपनियों में DIIs की हिस्सेदारी Foreign Institutional Investors (FIIs) से ज़्यादा हो गई। इसका मतलब है कि बाज़ार अब ज़्यादातर इंस्टीट्यूशनल स्ट्रेटेजीज़ (Institutional Strategies) से चल रहा है। ऐसे में, कम रिटेल पार्टिसिपेंट्स के कारण लिक्विडिटी (Liquidity) कम हो सकती है और वोलैटिलिटी (Volatility) बढ़ सकती है। 2025 में $18 अरब के FII आउटफ्लो (Outflow) हुए, जिसकी भरपाई मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) जैसे DIIs ने की है। DIIs का नेट इनफ्लो (Net Inflow) 2025 में ₹6 लाख करोड़ के पार पहुंच गया।

ज़रूरत से ज़्यादा लिवरेज, सट्टेबाजी और रेगुलेटरी जांच

बाज़ार के इन रुझानों पर रेगुलेटर SEBI (सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया) भी कड़ी नज़र रखे हुए है। SEBI खास तौर पर डेरिवेटिव्स सेगमेंट में सट्टेबाजी (Speculation) और रिटेल निवेशकों के नुकसान को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रहा है। 'फिनफ्लुएंसर्स' (Finfluencers) द्वारा गलत सलाह देने और नए निवेशकों को FOMO (Fear Of Missing Out) के जाल में फंसाने की शिकायतों के बाद SEBI की कार्रवाई तेज़ हो गई है। अक्टूबर 2025 से रिटेल निवेशकों के लिए रेगुलेटेड फ्रेमवर्क के तहत एल्गोरिथमिक ट्रेडिंग (Algorithmic Trading) शुरू की गई है, जिसका मकसद इस सेगमेंट को प्रोफेशनल बनाना है, लेकिन यह नई जटिलताएं भी लाती है। ज़रूरत से ज़्यादा लिवरेज (Leverage) और स्टॉक ब्रोकर्स को लोन देने पर लगी पाबंदियों ने सिस्टमैटिक रिस्क (Systematic Risk) को बढ़ाया है, जो घरेलू अर्थव्यवस्था और बाज़ार के लिए ख़तरा पैदा कर सकता है।

भविष्य का नज़रिया: अनिश्चितता के बीच सतर्क उम्मीद

आगे चलकर भारतीय इक्विटीज़ के लिए एक सतर्क नज़रिया बनाए रखने की सलाह दी जा रही है। हालांकि, 2026 के मध्य तक प्रमुख इंडेक्स के नए हाई (High) छूने की उम्मीद है, लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और संभावित वोलैटिलिटी इस उम्मीद को थोड़ा फीका कर रही हैं। 2026 के दूसरे हाफ में FIIs के नेट खरीदार बनने की उम्मीद है, जो कंपनी के मुनाफे में सुधार, महंगाई दर में कमी और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते जैसी प्रगति पर निर्भर करेगा। जनवरी 2026 में भारत की महंगाई दर 2.75% थी, जो RBI के लक्ष्य के दायरे में है, इससे मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) को स्थिरता मिल सकती है। हालांकि, 2025 में बाज़ार का पिछड़ना और DIIs पर निर्भरता यह दर्शाती है कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा, और रिटेल निवेशकों की सतत भागीदारी एक महत्वपूर्ण, लेकिन अनिश्चित, फैक्टर बनी रहेगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.