रेमिटेंस: भारत की इकोनॉमी की अहम कड़ी
भारत की इकोनॉमी के लिए रेमिटेंस (Remittances) किसी जीवनरेखा से कम नहीं हैं। ये न सिर्फ देश के मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Merchandise Trade Deficit) को पाटने में मदद करते हैं, बल्कि भारतीय रुपये (Rupee) को भी मजबूती देते हैं। लेकिन अब पश्चिम एशिया में जारी तनाव इस अहम प्रवाह के लिए बड़ा खतरा बन गया है।
रिकॉर्ड प्रवाह पर संकट?
फाइनेंशियल ईयर 2025 में, भारत में $135.46 बिलियन की रिकॉर्ड रेमिटेंस आई, जो देश के मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट का लगभग 47% हिस्सा कवर करती है। यह विदेशी मुद्रा का बड़ा जरिया देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को कम रखने और रुपये को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
खाड़ी देशों पर निर्भरता का जोखिम
चिंता की बात यह है कि ये पैसे मुख्य रूप से खाड़ी देशों (GCC) से आते हैं, जो इस समय भू-राजनीतिक अस्थिरता का केंद्र बने हुए हैं। भारत को आने वाले कुल रेमिटेंस का लगभग 38%, यानी करीब $51 बिलियन, इन्हीं GCC देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत से आता है। यह एक बड़ा कंसंट्रेशन रिस्क (Concentration Risk) पैदा करता है।
दोहरा झटका: तेल और प्रवाह दोनों पर असर
अगर पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका दोहरा असर भारत पर पड़ेगा। पहला, खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय मजदूरों की कमाई पर असर पड़ेगा, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह कम हो जाएगा। दूसरा, इस क्षेत्र की अस्थिरता के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में 10-15% तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे भारत का इम्पोर्ट बिल (Import Bill) बढ़ जाएगा।
इकोनॉमी पर संभावित दबाव
विश्लेषकों का अनुमान है कि इन दबावों के चलते भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) बढ़कर जीडीपी का 3-4% तक पहुंच सकता है। हालांकि, भारत के पास $600 बिलियन से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) है, लेकिन लगातार भू-राजनीतिक झटके लगने पर इसे इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जिससे रुपये की स्थिरता पर दबाव आ सकता है।
आगे क्या?
यह स्थिति भारत की बाहरी वित्तीय व्यवस्था (External Sector Financing) के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकती है। सरकारी अधिकारियों और बाजारों की निगाहें पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और मुद्रा पर पड़ सकता है।
