चालू खाते (Current Account) का मूल्यांकन
भारत के लगातार बढ़ते व्यापार घाटे (Merchandise Trade Gap) को भरने के लिए विदेशों से आने वाले निजी पैसे (Private Transfers) पर निर्भरता ऐतिहासिक रूप से रुपये को सहारा देती रही है। जहां फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) और पोर्टफोलियो फ्लो वैश्विक जोखिम पर निर्भर करते हैं, वहीं रेमिटेंस एक स्थिर और लगातार आने वाले पैसे का स्रोत रहा है।
लेकिन अब यह पैसा लेबर-आधारित आय से बदलकर वेस्टर्न टेक मार्केट की उठापटक और सख्त इमिग्रेशन नीतियों से जुड़ गया है। यह पैसा अब व्यापार घाटे का करीब 50% कवर करता है, जिससे वाशिंगटन की नीतियों या रियाद के आर्थिक दबाव में बदलाव का भारत के भुगतान संतुलन पर असर और भी ज्यादा बढ़ गया है।
स्किल-बेस्ड वल्नरेबिलिटी इंडेक्स
आंकड़े साफ दिखाते हैं कि रेमिटेंस का भौगोलिक स्रोत बदल रहा है। अमेरिका और अन्य विकसित देशों की ओर रुख बढ़ने से गल्फ देशों के ब्लू-कॉलर वर्कर्स की जगह अब ज्यादा कमाने वाले, लेकिन केंद्रित टेक प्रोफेशनल्स का दबदबा बढ़ा है। इससे भारतीय परिवारों की नकदी (Liquidity) और अमेरिकी टेक्नोलॉजी सेक्टर के प्रदर्शन के बीच सीधा संबंध बन गया है।
जैसे-जैसे अमेरिकी कंपनियां ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए लागत कम कर रही हैं, भारतीय डायस्पोरा की हाई-वेज वाली नौकरियां छंटनी का पहला निशाना बन रही हैं। इसका मतलब है कि जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीमी होगी, तो ये अहम रेमिटेंस ठीक उसी समय कम हो सकते हैं जब भारत को इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी।
मंदी की आशंका: स्ट्रक्चरल कॉन्ट्रैक्शन
जोखिम से बचने वाले दृष्टिकोण से, अमेरिकी बाजार पर निर्भरता एक बड़ी कमजोरी है। हाई-स्किल वीजा पर प्रस्तावित विधायी बोझ, जिसमें भारी शुल्क वृद्धि और ट्रांजेक्शन लेवी शामिल हैं, सीधे तौर पर भारत भेजे जाने वाले पैसे पर टैक्स जैसा है।
इसके अलावा, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देश 'लेबर-नेशनललाइजेशन' नामक एक रणनीतिक बदलाव से गुजर रहे हैं। सऊदी अरब की 'निताकत' (Nitaqat) जैसी पहलें अब सिर्फ लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि घरेलू रोजगार को प्राथमिकता देने के लिए सक्रिय नीति उपकरण हैं। यदि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आती है, तो ये देश विदेशी श्रमिकों को तेजी से हटा सकते हैं, जिससे मध्य पूर्व से आने वाला यह दूसरा, लेकिन लगातार बना रहने वाला रेमिटेंस पाइपलाइन बंद हो सकती है।
आगे की राह
बाजारों को अब रेमिटेंस ग्रोथ में संभावित कमी को ध्यान में रखना होगा। विश्लेषक अमेरिकी श्रम बाजार के आंकड़ों और रुपये की स्थिरता के बीच संबंध पर नजर रख रहे हैं। यदि रेमिटेंस स्रोतों का विविधीकरण नहीं होता है, या पश्चिमी श्रम बाजारों में बने रहने की लागत बढ़ती रहती है, तो पिछले एक दशक से मुद्रा का समर्थन करने वाला संरचनात्मक बफर आने वाले वित्तीय चक्रों में अपनी पहली महत्वपूर्ण गिरावट देख सकता है।
