रिकॉर्ड तोड़ रहा विदेशों में भारतीय कंपनियों का इन्वेस्टमेंट
भारतीय कंपनियों ने इस बार विदेशों में इन्वेस्टमेंट (Investment) करने का सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। चालू फाइनेंशियल ईयर 2025 के अंत तक, विदेशों में डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) के लिए कमिटमेंट्स (Commitments) $41.62 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए। वहीं, फरवरी 2026 तक फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए भी यह आंकड़ा $39.8 बिलियन तक पहुंच गया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 11% की जोरदार बढ़ोतरी दर्शाता है। अब इन विदेशी निवेशों में सबसे बड़ा हिस्सा इक्विटी (शेयरों में हिस्सेदारी) का है, जो दिखाता है कि भारतीय कंपनियां विदेशों में सीधे ओनरशिप लेने को तरजीह दे रही हैं। इस बड़े पैमाने पर हो रहे कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflow) का एक बड़ा उदाहरण Reliance Industries Limited की अमेरिका में $300 बिलियन की नई ऑयल रिफाइनरी स्थापित करने की योजना है। यह दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल आउटबाउंड इन्वेस्टमेंट डील्स में से एक हो सकती है। यह ट्रेंड साफ दिखाता है कि पैसा कैसे घरेलू बाजारों से बाहर जा रहा है, जिससे भारत की अपनी इन्वेस्टमेंट जरूरतों और उपलब्ध पूंजी पर सवाल उठ रहे हैं।
कहां और क्यों कर रहे हैं भारतीय कंपनियां विदेश में निवेश?
फाइनेंशियल ईयर 2026 में अब तक, सिंगापुर भारतीय कंपनियों के विदेशी निवेश का सबसे बड़ा डेस्टिनेशन (Destination) बना हुआ है, जिसने 23.84% कमिटमेंट्स को आकर्षित किया है। इसके बाद यूनाइटेड स्टेट्स 12.79% के साथ दूसरे और मॉरीशस 11.3% के साथ तीसरे स्थान पर है। सेक्टर की बात करें तो, फाइनेंशियल, इंश्योरेंस और बिजनेस सर्विसेज ने फाइनेंशियल ईयर 2025 में ODI का सबसे बड़ा हिस्सा, यानी 39.56% हासिल किया। यह साल 2020 के 13.67% के मुकाबले एक बड़ा उछाल है, जो ग्लोबल सर्विस बिजनेस की ओर एक शिफ्ट दिखा रहा है। भारतीय कंपनियां फिनटेक (Fintech) और वेल्थ मैनेजमेंट (Wealth Management) जैसे क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल करके अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों के मजबूत फाइनेंशियल सिस्टम और ग्लोबल फंड तक पहुंच का फायदा उठाना चाहती हैं।
लोकल फंड्स और इकोनॉमी पर चिंताएं
विदेशों में इन्वेस्टमेंट के इस बढ़ते सिलसिले ने भारत के भीतर फंड की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। बड़े पैमाने पर हो रहे आउटबाउंड इन्वेस्टमेंट से घरेलू प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी की कमी हो सकती है, जिससे नए बिजनेस, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और रोजगार सृजन पर असर पड़ सकता है। एनालिस्ट्स (Analysts) को डर है कि यह बड़ा कैपिटल आउटफ्लो भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को और बढ़ा सकता है, रुपये को कमजोर कर सकता है और देश व उसकी कंपनियों के लिए उधार लेना महंगा बना सकता है। जहां ग्लोबल विस्तार विविधीकरण (Diversification) का मौका देता है, वहीं Reliance की प्रस्तावित रिफाइनरी जैसी भारी-भरकम कमिटमेंट्स जोखिम भी लाती हैं। ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स की सफलता महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी तरह की देरी या खराब परफॉर्मेंस से कंपनी और मार्केट का मूड प्रभावित हो सकता है, खासकर तब जब लोकल फंड्स पहले से ही टाइट (Tight) हों।
आगे क्या?
यह ट्रेंड साफ दिखाता है कि भारतीय कंपनियां, खासकर फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे हाई-ग्रोथ (High-growth) सेक्टर्स में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करने की जोरदार कोशिश कर रही हैं। जहां यह ग्लोबल एक्सपेंशन (Global Expansion) लंबे समय में मार्केट डाइवर्सिफिकेशन और बेहतर कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) जैसे फायदे दे सकता है, वहीं भारत की मनी सप्लाई (Money Supply) और आर्थिक स्थिरता पर इसके असर पर कड़ी नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। पॉलिसीमेकर्स (Policymakers) को घरेलू इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ग्रोथ को संतुलित करने की जरूरत होगी ताकि देश का विकास संतुलित बना रहे।
