दरें स्थिर रहने की प्रबल उम्मीद
देश-विदेश के ज़्यादातर इकोनॉमिस्ट्स (Economists) और मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) का यही मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) 6 फरवरी 2026 को होने वाली अपनी बैठक में रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखेगी। रॉयटर्स (Reuters) पोल में शामिल ज़्यादातर विशेषज्ञों ने भी इसी ओर इशारा किया है। ऐसा लग रहा है कि केंद्रीय बैंक नीतिगत समायोजन (Policy Adjustment) पर फौरन कोई कदम उठाने के बजाय स्थिरता बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करेगा। नोमुरा (Nomura), सिटी इंडिया (Citi India), एसबीआई (SBI) और जेपी मॉर्गन (JPMorgan) जैसे संस्थानों के अर्थशास्त्रियों का भी यही मानना है कि RBI मौजूदा आर्थिक संकेतकों (Economic Indicators) का और मूल्यांकन करने के बाद ही आगे की रणनीति तय करेगा।
रुपये पर दबाव और कैपिटल फ्लोज़ का खेल
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में है। हाल ही में 29 जनवरी 2026 को यह 92.00 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छू गया था। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रुपये की कमजोरी की वजह वैश्विक अनिश्चितता (Global Uncertainty) को बताया है, जबकि देश की आर्थिक बुनियाद (Domestic Fundamentals) मजबूत है। विश्लेषकों का कहना है कि डायरेक्ट फॉरेन इन्वेस्टमेंट (FDI) का फ्लो (Flow) करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को फाइनेंस करने के लिए काफी नहीं है, जो एक पुरानी समस्या है और जिसे वैश्विक अस्थिरता (Global Volatility) और बढ़ा रही है। यदि वैश्विक उथल-पुथल जारी रहती है, तो नीति निर्माता रुपये को झटके झेलने देने का विकल्प चुन सकते हैं, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को बचाया जा सके और मॉनेटरी पॉलिसी घरेलू लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर सके। MUFG जैसे मार्केट एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 2026 तक रुपया कमजोर बना रह सकता है। फिलहाल, 2 फरवरी 2026 तक विनिमय दर (Exchange Rate) लगभग 91.71 रुपये प्रति डॉलर के आसपास कारोबार कर रही है।
महंगाई की चाल और CPI सीरीज में बदलाव
दिसंबर 2025 में भारत की रिटेल महंगाई दर (Consumer Price Inflation) 1.33% पर थी, जो RBI के 2%-6% के लक्ष्य दायरे (Target Band) से काफी नीचे है। हालांकि, महंगाई का यह नरम रुख दरों में कटौती (Easing) को बढ़ावा दे सकता था, लेकिन कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) सीरीज में आगामी बदलाव को लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) द्वारा 12 फरवरी 2026 से लागू की जाने वाली नई बास्केट के चलते महंगाई के आंकड़े थोड़े बढ़ सकते हैं। SBI के सौम्या कांति घोष जैसे विशेषज्ञों का अनुमान है कि नई सीरीज के तहत भोजन (Food Items) पर भार कम होने से कुल CPI में 20-30 बेसिस पॉइंट्स (Basis Points) की बढ़ोतरी हो सकती है। नोमुरा को उम्मीद है कि नई वेटेज प्रणाली (Weighting System) के तहत हेडलाइन इन्फ्लेशन (Headline Inflation) औसतन 2.2% रह सकती है। सेवाओं (Services) और शहरी लागतों (Urban Costs) पर ज़्यादा ज़ोर देने के साथ यह बदलाव MPC के लिए महंगाई की गति (Inflation Momentum) पर नज़र रखने की चुनौती बढ़ाएगा, जिससे एक सतर्क दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है।
बॉन्ड यील्ड्स पर 'फिस्कल' और ग्लोबल असर
बॉन्ड बाज़ार (Bond Markets) फिस्कल (Fiscal) यानी सरकारी खर्चों के परिदृश्य को लेकर संवेदनशील रहा है, खासकर केंद्रीय बजट की घोषणाओं के बाद। वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए सरकार का ग्रॉस बॉरोइंग (Gross Borrowing) अनुमान 17.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो उम्मीद से ज़्यादा है। यह आंकड़ा बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) पर ऊपर की ओर दबाव डाल सकता है। 30 जनवरी 2026 को 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (10-year G-Sec Yield) लगभग 6.695% पर थी, लेकिन बजट के बाद उधार अनुमानों के कारण इसमें थोड़ी तेज़ी देखी गई। RBI लिक्विडिटी (Liquidity) का प्रबंधन कर रहा है, लेकिन यह बड़ी उधार राशि और वैश्विक ब्याज दरों (Global Interest Rates) की अनिश्चितताएं यील्ड प्रबंधन के लिए एक जटिल माहौल बना रही हैं। SBI के सौम्या कांति घोष का मानना है कि यील्ड्स को स्थिर करने में केंद्रीय बैंक का स्पष्ट संचार (Clear Communication) महत्वपूर्ण होगा।
आउटलुक: ग्रोथ और स्थिरता के बीच संतुलन
रुपये की अस्थिरता और महंगाई के अनिश्चित परिदृश्य जैसी चुनौतियों के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था लचीलापन (Resilience) दिखा रही है। वित्त वर्ष 2025-26 (FY25-26) में रियल GDP ग्रोथ (Real GDP Growth) 7.4% रहने का अनुमान है। हालांकि, ग्रोथ की कहानी अब सरकारी खर्चों पर ज़्यादा निर्भर करती दिख रही है, न कि निजी निवेश (Private Investment) पर। RBI के सामने एक नाजुक संतुलन बनाना है: पिछली दर कटौतियों (Rate Cuts) के ज़रिए ग्रोथ को समर्थन देना, कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और अत्यधिक रुपये में गिरावट को रोकना। आने वाली पॉलिसी मीटिंग का मुख्य ध्यान पॉलिसी ट्रांसमिशन (Policy Transmission) और स्थिरता पर रहेगा, और यह उम्मीद की जा रही है कि 2026 के दौरान दरें स्थिर रह सकती हैं। निवेशक RBI के वैश्विक जोखिमों (Global Risks), घरेलू मांग (Domestic Demand) और फिस्कल उपायों (Fiscal Measures) के आकलन पर बारीकी से नज़र रखेंगे।