RBI की 10 साल की इन्फ्लेशन टारगेटिंग पॉलिसी
RBI ने मई 2016 में RBI एक्ट में संशोधन के साथ अपनी इन्फ्लेशन टारगेटिंग मॉनेटरी पॉलिसी फ्रेमवर्क की शुरुआत की थी। इसके तहत, सेंट्रल बैंक को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) इन्फ्लेशन के लिए 4% का औपचारिक लक्ष्य दिया गया, जिसमें 2% से 6% तक का टॉलरेंस बैंड शामिल था। यह लक्ष्य तब से लगातार रिन्यू होता रहा है।
इस फ्रेमवर्क ने मॉनेटरी पॉलिसी के संचालन को काफी बेहतर बनाया है, जिससे RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) को एक स्पष्ट, स्वतंत्र लक्ष्य मिला है जो प्राइस स्टेबिलिटी पर केंद्रित है।
महंगाई को काबू में करने में RBI की सफलता
इस पॉलिसी के तहत, भारत ने महंगाई के मोर्चे पर काफी बेहतर नतीजे देखे हैं। अगस्त 2016 से दिसंबर 2025 तक, औसत CPI इन्फ्लेशन 7.4% से घटकर 4.6% पर आ गया। कीमतों की स्थिरता में भी सुधार हुआ, जिसमें CPI इन्फ्लेशन का स्टैंडर्ड डेविएशन 3.2 से गिरकर 1.9 हो गया।
RBI अपने प्रदर्शन के लिए जवाबदेह रहा है। जब महंगाई लगातार तीन तिमाहियों तक 6% की ऊपरी सीमा से ऊपर रही, तब ही उसे सरकार को रिपोर्ट करना पड़ा। यह प्रभावी प्रबंधन को दर्शाता है, खासकर कोविड-19 महामारी और भू-राजनीतिक संघर्षों जैसे वैश्विक झटकों के बावजूद।
ग्रोथ बनाम प्राइस स्टेबिलिटी की बहस
रिसर्च से पता चलता है कि RBI की मॉनेटरी पॉलिसी का महंगाई पर मजबूत फोकस रहा है। टेलर रूल (Taylor rule) का उपयोग करके किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि पॉलिसी ने ग्रोथ फैक्टर्स (1.53) की तुलना में महंगाई डेविएशन (3.92) पर कहीं ज्यादा प्रतिक्रिया दी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ग्रोथ के लक्ष्यों को नजरअंदाज किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस पॉलिसी ने अल्पकालिक आर्थिक उतार-चढ़ावों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया है। इससे यह चिंता कम हुई है कि इन्फ्लेशन टारगेटिंग भारत की विशिष्ट आर्थिक स्थिति में ग्रोथ को अनुचित रूप से सीमित कर सकती है। इस फ्रेमवर्क की सफलता भविष्य की आर्थिक योजना के लिए एक स्थिर आधार प्रदान करती है।
