भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल का झटका
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। खासकर, कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी उछाल ने चिंता बढ़ा दी है। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) $100 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, और अप्रैल 2026 तक आयात का औसत $102.46 रहा है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, क्योंकि मार्च 2026 में खुदरा महंगाई (retail inflation) बढ़कर 13 महीने के उच्चतम स्तर 3.4% पर पहुँच गई, जो फरवरी में 3.21% थी। ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी इसका मुख्य कारण रही। RBI ने फाइनेंशियल ईयर 27 के लिए महंगाई दर 4.6% रहने का अनुमान लगाया है, जबकि कोर इन्फ्लेशन (core inflation) 4.4% रहने की उम्मीद है, जो RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर है।
RBI की 'रुको और देखो' नीति
इन चुनौतियों के बावजूद, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी मॉनेटरी पॉलिसी रिव्यू मीटिंग में प्रमुख ब्याज दर, यानी रेपो रेट (repo rate) को 5.25% पर स्थिर रखा है। साथ ही, RBI ने अपनी 'न्यूट्रल' यानी तटस्थ मौद्रिक नीति (monetary policy) का रुख भी बनाए रखा है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि पश्चिम एशिया का संघर्ष एक बड़ा सप्लाई शॉक है, जिसका विकास (growth) पर नकारात्मक और महंगाई पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। RBI फिलहाल वैश्विक स्थिति और मौद्रिक नीति के असर का इंतजार कर रही है। अच्छी बात यह है कि भारत के फॉरेक्स रिजर्व्स (forex reserves) $700 अरब से ऊपर पहुंच गए हैं, जो बाहरी झटकों से निपटने में मदद करेंगे।
सरकार की कर्ज प्रबंधन रणनीति
सरकार ने फाइनेंशियल ईयर 27 की पहली छमाही के लिए अपने बॉरोइंग कैलेंडर में बदलाव किया है। इसमें लंबी अवधि के बॉन्ड्स (bonds) की अवधि और हिस्सेदारी कम की गई है। बॉन्ड मार्केट ने इस कदम का स्वागत किया है, क्योंकि इससे पहले आपूर्ति-मांग असंतुलन के कारण यील्ड्स (yields) बढ़ रही थीं। 30-वर्षीय और 10-वर्षीय यील्ड्स के बीच का अंतर घटकर 62 बेसिस पॉइंट रह गया है। RBI की लिक्विडिटी ऑपरेशंस (liquidity operations) के साथ मिलकर, ये रणनीति फिक्स्ड-इनकम निवेश के लिए अधिक स्थिर माहौल बनाने का लक्ष्य रखती है।
अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां
स्थिरता के बावजूद, भारत को कुछ लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अल नीनो (El Niño) की संभावित दस्तक से मॉनसून कमजोर रह सकता है, जिसका सीधा असर खेती, खाद्य कीमतों और ग्रामीण मांग पर पड़ेगा। सरकार इस जोखिम को कम करने के उपाय कर रही है। फाइनेंशियल ईयर 26 की तीसरी तिमाही में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) बढ़कर $13.2 अरब हो गया, जिसका मुख्य कारण कच्चे तेल के आयात की बढ़ी हुई लागत से मर्चेंडाइज ट्रेड गैप (merchandise trade gap) में बढ़ोतरी है। इसके अलावा, मजबूत अमेरिकी डॉलर और पोर्टफोलियो आउटफ्लो (portfolio outflows) ने भारतीय रुपये पर दबाव डाला है, जिससे इसमें गिरावट आई है।
विश्लेषकों की राय और विकास का अनुमान
विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों के $90-100 प्रति बैरल रहने पर भी, घरेलू खपत मजबूत रहने के कारण भारत का ग्रोथ रेट 7% से ऊपर बना रह सकता है। हालांकि, मूडीज (Moody's) का अनुमान है कि 2026 में भारत की बेरोजगारी दर 7% तक बढ़ सकती है, और महंगाई 4.5% तक जा सकती है। वहीं, OCBC का अनुमान है कि कच्चे तेल में हर $10 की बढ़ोतरी भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट को 40-50 बेसिस पॉइंट या 0.3% GDP तक बढ़ा सकती है। अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का मानना है कि 2026 में 50 बेसिस पॉइंट तक की ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं।
आगे की राह
भारत का आर्थिक भविष्य काफी हद तक पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कम होने और वैश्विक कमोडिटी कीमतों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करेगा। RBI का रुख बताता है कि जब तक ऊर्जा झटके या मौसम संबंधी जोखिम कीमतों को बड़े पैमाने पर प्रभावित नहीं करते, तब तक ब्याज दरें स्थिर रहेंगी। निवेशकों को महंगाई के रुझानों और ग्रोथ मोमेंटम पर नजर रखने की सलाह दी जाती है।
