तेल की कीमतें ऊँची, RBI की चिंताएं बढ़ीं
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक नई एनालिसिस बताती है कि कच्चे तेल की कीमतें 2026 तक $80-85 प्रति बैरल के स्तर पर बनी रहेंगी। यह पहले के $70 प्रति बैरल के अनुमानों से काफी ऊपर है, जिसका मुख्य कारण ग्लोबल अस्थिरता और सप्लाई की दिक्कतें हैं। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह लगातार ऊंची ऊर्जा लागत महंगाई बढ़ाएगी, रुपये को और कमजोर करेगी और केंद्रीय बैंक, आरबीआई, पर पॉलिसी बनाने का दबाव डालेगी।
ग्रोथ और महंगाई के अनुमानों में भारी अंतर
महंगे तेल के इस झटके ने भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) के अनुमानों में बड़ी दरार डाल दी है। जहाँ S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने मजबूत डोमेस्टिक डिमांड के दम पर फाइनेंशियल ईयर 27 (FY27) के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.1% कर दिया है, वहीं कुछ अन्य संस्थाएं सतर्क हैं। गोल्डमैन सैक्स ने जहाँ ऊँचे तेल दाम और कमजोर रुपये का हवाला देते हुए 2026 के लिए GDP का अनुमान घटाकर 5.9% कर दिया है, वहीं मूडीज ने भी ग्लोबल संघर्षों को देखते हुए FY27 के लिए ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.0% कर दिया है। फाइनेंशियल ईयर 27 के लिए महंगाई का अनुमान भी बढ़कर 4.3% से 4.8% के बीच रहने की उम्मीद है, जो आरबीआई के 2% से 6% के महंगाई लक्ष्य को चुनौती दे सकता है।
RBI के सामने 'संतुलन' का खेल: रुपया, महंगाई और ग्रोथ
बढ़ते बाहरी जोखिमों और महंगाई के दबाव के बीच, यह उम्मीद की जा रही है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी मुख्य ब्याज दर (Key Interest Rate) को 5.25% पर अपरिवर्तित रखेगा और पॉलिसी को न्यूट्रल (Neutral) बनाए रखेगा। केंद्रीय बैंक का मुख्य ध्यान देश की मनी सप्लाई (Money Supply) को मैनेज करने और करेंसी की अटकलों (Currency Speculation) को रोकने पर होगा। हाल ही में डॉलर के मुकाबले रुपया 92.98 के स्तर पर फिसल गया है। ग्लोबल तनाव के बीच रुपये को स्थिर करने के लिए बैंकों की ओपन पोजीशन पर नए नियम भी लागू किए गए हैं, जबकि तेल की कीमतें एक समय $100 प्रति बैरल को पार कर गई थीं। आरबीआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती: आर्थिक विकास को सहारा देना और इंपोर्टेड इन्फ्लेशन (Imported Inflation) को रोकना, ताकि प्राइस स्टेबिलिटी (Price Stability) बनी रहे।
भारत और इमर्जिंग मार्केट्स पर 'स्टैगफ्लेशन' का खतरा
ऊँचे तेल दाम, ग्लोबल अस्थिरता और संभावित उच्च ब्याज दरों का यह कॉम्बिनेशन भारत और अन्य इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) के लिए स्टैगफ्लेशन (Stagflation) यानी धीमी ग्रोथ और बढ़ती महंगाई के रिस्क को बढ़ा रहा है। ऊर्जा सप्लाई में लंबा व्यवधान आर्थिक मंदी, बड़े ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और सरकारी बजट पर दबाव बढ़ा सकता है। भारत का इन्फ्लेशन एनर्जी कॉस्ट के प्रति ज्यादा संवेदनशील है, और कमजोर रुपया इंपोर्टेड इन्फ्लेशन को और खराब करता है। ऐसे हालात आरबीआई के लिए पॉलिसी के फैसले और मुश्किल बना सकते हैं।