RBI का वार! रिकॉर्ड तोड़ रुपया, आर्बिट्रेज पर कसा शिकंजा

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
RBI का वार! रिकॉर्ड तोड़ रुपया, आर्बिट्रेज पर कसा शिकंजा
Overview

भारतीय कंपनियों ने **30 मार्च 2026** को NDF मार्केट में करीब **7 अरब डॉलर** की आर्बिट्रेज विंडो का फायदा उठाया, जिससे रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की कड़ी एक्शन के चलते करेंसी **₹93** के आसपास स्थिर हुई है।

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कैसे हुआ आर्बिट्रेज और क्यों गिरा रुपया?

RBI की ओर से लोकल बैंकों पर फॉरेक्स (Forex) पोजीशन को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, बैंक अपनी डॉलर होल्डिंग कम कर रहे थे। इस कमी को पूरा करने के लिए, उन्होंने ऑफशोर NDF (Non-Deliverable Forward) मार्केट में डॉलर खरीदने शुरू कर दिए। इस वजह से घरेलू डॉलर रेट और ऑफशोर NDF रेट के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया, जिसे भारतीय कॉर्पोरेट्स ने भुनाया।

आर्बिट्रेज का पूरा खेल

RBI के निर्देशों के तहत, बैंकों ने अपनी ऑनशोर डॉलर पोजीशन घटाई और ऑफशोर NDF मार्केट में डॉलर खरीदे। इससे ऑनशोर डॉलर की कीमतें और ऑफशोर NDF की कीमतें आपस में काफी अलग हो गईं। यहीं पर भारतीय कॉर्पोरेट्स ने मौके का फायदा उठाया। उन्होंने डोमेस्टिक मार्केट में डॉलर खरीदे और NDF मार्केट में बेचकर मुनाफा कमाया। क्लियरिंग हाउस के आंकड़ों के अनुसार, 30 मार्च 2026 को NDF क्लाइंट ट्रेडिंग वॉल्यूम $7.54 बिलियन तक पहुंच गया, जिसमें कॉर्पोरेट की डॉलर बिक्री $7.51 बिलियन थी। उस समय USD/INR स्पॉट रेट 94.50 के आसपास था, जो दिन के कारोबार में 94.70 के हाई तक पहुंचा और फिर 95.20 के ऑल-टाइम लो तक गिर गया।

RBI की ताबड़तोड़ एक्शन

कॉर्पोरेट आर्बिट्रेज गतिविधि सीधे तौर पर RBI के रुपये को मजबूत करने के लक्ष्य के खिलाफ जा रही थी। डॉलर की इस भारी मांग ने 30 मार्च 2026 को रुपये को 95 के पार धकेल दिया, जिससे रेगुलेटरी पहलों पर पानी फिर गया। जवाब में, RBI ने अपनी दखलअंदाजी बढ़ा दी। केंद्रीय बैंक ने लोकल बैंकों को क्लाइंट्स के लिए NDF सेवाएं देने से मना कर दिया और कंपनियों को रद्द किए गए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को फिर से बुक करने की इजाजत नहीं दी। इन सख्त कदमों से RBI को करेंसी मार्केट पर कंट्रोल वापस पाने में मदद मिली है, और 6 अप्रैल 2026 तक रुपया ₹93 के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा था।

आगे क्या?

RBI का यह एक्शन पहले के सीधे मार्केट इंटरवेंशन से काफी अलग और आक्रामक है। जानकारों का मानना है कि RBI का यह टारगेटेड स्ट्रैटेजी मार्केट कंट्रोल बहाल करने के लिए जरूरी था। ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं के कारण इमर्जिंग मार्केट करेंसी पर पहले से दबाव था। RBI की सख्त रेगुलेटरी कार्रवाई ने सट्टेबाजी (Speculative) फ्लो को रोकने में मदद की है। हालांकि, डॉलर की स्ट्रक्चरल डिमांड और महंगाई का दबाव रुपये पर बने रहने की आशंका है, जो इसकी लंबी अवधि की रिकवरी को सीमित कर सकते हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.