भारत ने वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में $7.1 बिलियन का चालू खाता सरप्लस दर्ज किया है। वहीं, पूरे वित्तीय वर्ष में $25.2 बिलियन का घाटा बढ़ा है। हालांकि, सर्विस एक्सपोर्ट और रेमिटेंस (विदेशों से भेजा गया पैसा) ने सहारा दिया, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेश का बड़ा बहिर्वाह चुनौतियां पेश कर रहे हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि RBI के नए उपाय बाजार की स्थिरता को कैसे प्रभावित करते हैं।
क्या हुआ?
वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में भारत ने $7.1 बिलियन का चालू खाता सरप्लस (Current Account Surplus) दर्ज किया। यह एक अप्रत्याशित सकारात्मक आंकड़ा था, जिसमें आईटी और बिजनेस सर्विसेज जैसे सर्विस एक्सपोर्ट (Service Exports) की मजबूत ग्रोथ और विदेशों से आने वाले पैसे (Remittance Inflows) का बड़ा योगदान रहा।
लेकिन, पूरे वित्तीय वर्ष 2026 के लिए तस्वीर कुछ अलग रही। देश ने सालाना $25.2 बिलियन का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) दर्ज किया, जो GDP का 0.6% है। यह पिछले साल के $23.3 बिलियन के घाटे से अधिक है। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल के आयात की बढ़ती लागत के कारण $51 बिलियन का माल व्यापार घाटा (Goods Trade Deficit) बढ़ना रहा।
निवेशकों के लिए बड़ी तस्वीर
सीधे शब्दों में कहें तो, चालू खाता किसी देश के व्यापार और अन्य लेन-देन के माध्यम से आने वाले और बाहर जाने वाले पैसों का शुद्ध लेखा-जोखा है। निवेशकों के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय रुपये (Indian Rupee) के मूल्य और आयात की कुल लागत को प्रभावित करता है।
जब कोई देश घाटे में चलता है, तो उसे अपने खातों को संतुलित करने के लिए विदेशी पूंजी (Foreign Capital) को आकर्षित करने की आवश्यकता होती है। यदि यह पूंजी का प्रवाह धीमा हो जाता है, तो यह मुद्रा पर दबाव डाल सकता है और संभवतः आयातित महंगाई (Imported Inflation) को बढ़ा सकता है, जो कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करता है।
कैपिटल फ्लो की चुनौती
भले ही चौथी तिमाही का सरप्लस एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन वित्त वर्ष 2026 के लिए पूंजी प्रवाह (Capital Inflows) में महत्वपूर्ण चुनौतियां दिखीं। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने इक्विटी से ₹2.5 लाख करोड़ से अधिक की निकासी की, जो पिछले साल की निकासी से भी ज्यादा है। इसके अलावा, नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) के डिपॉजिट में 11% की कमी आई और एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग्स (ECBs) में 23% की गिरावट आई।
यह रुझान बताता है कि वैश्विक निवेशक भारतीय इक्विटी से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे व्यापार घाटे को पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
RBI की रणनीति
इन बहिर्वाहों (Outflows) को प्रबंधित करने और स्थिति को स्थिर करने के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार ने कई कदम उठाए हैं। RBI ने बैंकों के लिए एक डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा (Dollar-Rupee Swap Facility) शुरू की है, ताकि वे एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट (FCNR(B) Deposits) को प्रोत्साहित कर सकें। बैंकों को इन डिपॉजिट पर ब्याज दरें बढ़ाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है ताकि अधिक धन आकर्षित हो सके।
इसके अलावा, सरकार ने विदेशी निवेश को भारतीय डेट मार्केट्स (Debt Markets) में आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया है। इसके लिए सरकारी सिक्योरिटीज पर लगने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) और इंटरेस्ट टैक्स (Interest Tax) को हटाया गया है। यह एक रणनीतिक बदलाव है जिसका उद्देश्य इक्विटी बाजारों में देखी गई अस्थिरता की भरपाई के लिए डेट-केंद्रित विदेशी निवेश का एक अधिक स्थिर आधार बनाना है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर, विश्लेषकों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 के लिए चालू खाता घाटा GDP के 2% से अधिक हो सकता है। वैश्विक ऊर्जा की कीमतें मुख्य कारक होंगी; यदि तेल महंगा रहता है, तो आयात बिल ऊंचा रहेगा।
निवेशक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि सरकार डेट-आधारित FPI प्रवाह को आकर्षित करने में कितनी सफल होती है, क्योंकि इससे रुपये को स्थिर करने में मदद मिल सकती है। इसके अतिरिक्त, बाजार सहभागियों (Market Participants) को नए व्यापार समझौतों (Trade Agreements) पर किसी भी अपडेट की निगरानी करनी चाहिए, क्योंकि ये आने वाले महीनों में आयात और निर्यात के संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि RBI इन पूंजीगत प्रवाहों को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के मुकाबले कैसे संतुलित करता है।
