साल 2026 की पहली तिमाही (Q1) में भारतीय डील मार्केट में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। मर्जर और एक्विजिशन (M&A) का कुल मूल्य 44.5% घटकर $17.4 बिलियन रह गया, जो 2021 के बाद से सबसे कमजोर पहली तिमाही रही। यह गिरावट वैश्विक अनिश्चितताओं (Global Headwinds) के बीच आई है।
हालांकि, इस निराशाजनक तस्वीर के बीच कुछ अच्छे संकेत भी थे। विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में किए गए अधिग्रहण (Inbound M&A) में 65.9% का जबरदस्त उछाल आया और यह $7 बिलियन तक पहुंच गया, जो 2024 के बाद से किसी भी पहली तिमाही का उच्चतम स्तर है। वहीं, इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) मार्केट ने 2018 के बाद से अपना सबसे मजबूत प्रदर्शन करते हुए निवेशकों को आकर्षित किया।
डील एक्टिविटी मुख्य रूप से हाई-टेक्नोलॉजी (High-Technology) और इंडस्ट्रियल (Industrial) सेक्टर में केंद्रित रही। हाई-टेक सेक्टर में $2.9 बिलियन की डील वैल्यू देखी गई, जो पिछले साल की तुलना में 40.8% अधिक है। इसके बाद इंडस्ट्रियल सेक्टर $2.65 बिलियन के साथ दूसरे स्थान पर रहा।
IPO मार्केट में भी अच्छी खासी मजबूती दिखी। Q1 2026 में IPO से $2.5 बिलियन जुटाए गए, जो पिछले साल की इसी अवधि से 7.8% ज्यादा है। भारत दुनिया भर में IPO के जरिए फंड जुटाने वाले प्रमुख देशों में से एक बना रहा।
प्राइवेट इक्विटी (Private Equity) की भागीदारी वाले M&A सौदे $5.5 बिलियन पर रहे, जो पिछले साल से 20.8% कम हैं। यह दर्शाता है कि वैल्यूएशन संबंधी चिंताओं और बाजार की अस्थिरता के कारण फाइनेंशियल निवेशक सतर्क हैं।
इस सुस्ती के पीछे कई जोखिम कारक हैं। वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और प्रमुख व्यापारिक भागीदारों से टैरिफ जैसी समस्याएं डील पाइपलाइन को प्रभावित कर रही हैं। घरेलू M&A में आई भारी गिरावट स्थानीय कॉरपोरेट आत्मविश्वास या बैलेंस शीट में कमजोरी का संकेत भी दे सकती है।
बाजार में आई इस सुस्ती का असर इन्वेस्टमेंट बैंकिंग (Investment Banking) की फीस पर भी पड़ा, जो 31% घटकर $231.4 मिलियन रह गई। यह 2018 के बाद से पहली तिमाही का सबसे निचला स्तर है।
भविष्य की राह: क्या उम्मीद करें?
आगे चलकर, भारत का M&A मार्केट विदेशी निवेश सुधारों (Foreign Investment Reforms) और प्राइवेट इक्विटी (Private Equity) की निरंतर रुचि के कारण मजबूत बना रहने की उम्मीद है। खासकर जब वैल्यूएशन मल्टीपल (Valuation Multiples) ऐतिहासिक स्तरों के करीब स्थिर हो सकते हैं। सरकारी प्रयास और संभावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (Free Trade Agreements) क्रॉस-बॉर्डर एक्टिविटी को और बढ़ावा दे सकते हैं। वर्तमान चुनौतियों के बावजूद, डील पाइपलाइन मजबूत दिख रही है। हालांकि, भू-राजनीतिक स्थिरता और घरेलू आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं इस गतिविधि को कुछ हद तक सीमित कर सकती हैं।