भारत में गरीबी: 5% के सरकारी दावों पर सवाल! बढ़ता कर्ज़ और घटती आमदनी, क्या है असली हकीकत?

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत में गरीबी: 5% के सरकारी दावों पर सवाल! बढ़ता कर्ज़ और घटती आमदनी, क्या है असली हकीकत?
Overview

विकास अर्थशास्त्री संतोष मेहरा (Santosh Mehrotra) ने भारत की गरीबी दर के 5% पर आने के सरकारी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि असलियत इससे कोसों दूर है और लाखों परिवार बढ़ते घरेलू कर्ज़ (Household Debt) के बोझ तले दब रहे हैं, जबकि उनकी आमदनी (Wages) लगातार स्थिर बनी हुई है।

गरीबी के आंकड़ों पर छिड़ा घमासान

हाल ही में भारत सरकार ने दावा किया है कि देश में गरीबी दर घटकर सिर्फ 5% रह गई है। लेकिन, जाने-माने विकास अर्थशास्त्री संतोष मेहरा इस आंकड़े को 'भ्रामक' बता रहे हैं। मेहरा का कहना है कि गरीबी को मापने का तरीका और इस्तेमाल की गई मेथोडोलॉजी (Methodology) में बड़े बदलाव किए गए हैं, जिससे पुराने और नए आंकड़ों की सीधे तुलना करना गलत है। उन्होंने बताया कि अगर 2011-12 के सर्वे की तरह ही मेथोडोलॉजी का इस्तेमाल किया जाए, तो गरीबी दर लगभग 26% के आसपास बैठती है। वर्ल्ड बैंक (World Bank) के $3 प्रति दिन (PPP) के हिसाब से भी 2022-23 में भारत में गरीबी 5.3% थी, जो सरकारी आंकड़े से थोड़ी ज्यादा है। वहीं, मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स (MPI) के अनुसार, 2022-23 में यह दर 11.28% थी, हालांकि यह गरीबी मापने का एक अलग पैमाना है।

छंटनी और खेती की ओर वापसी

मेहरा की मानें तो, गैर-कृषि क्षेत्र (Non-agricultural employment) में नौकरियों का विकास पिछले कुछ सालों में काफी धीमा पड़ गया है। इसका नतीजा यह है कि लाखों लोग, जिनकी संख्या 80 मिलियन (8 करोड़) तक बताई जा रही है, कोरोना महामारी के बाद वापस खेती-बाड़ी की ओर लौट गए हैं। 2018-19 से 2023-24 के बीच, कुल रोज़गार में कृषि का हिस्सा 42.5% से बढ़कर 46.1% हो गया है। यह दर्शाता है कि उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं हो पा रही हैं। इस वजह से, लाखों लोगों की असली आमदनी (Real wages) बढ़ नहीं पाई है, जिससे उनके लिए गुजारा करना मुश्किल हो गया है। भारत को 2030 तक अपनी बढ़ती युवा आबादी के लिए हर साल करीब 7.85 मिलियन (78.5 लाख) गैर-कृषि नौकरियां पैदा करने की ज़रूरत है, जैसा कि इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) में भी कहा गया है।

घरों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ

आर्थिक स्थिति की सबसे चिंताजनक बात यह है कि आमदनी स्थिर रहने और बचत में गिरावट के बावजूद, लोग अपना खर्च चलाने के लिए भारी कर्ज़ ले रहे हैं। 2000-2011 के बीच जहां भारत की घरेलू बचत (Household savings) जीडीपी (GDP) का औसतन 22.9% थी, वहीं 2012-2023 के बीच यह घटकर 18.4% रह गई। इसके मुकाबले, 2019-20 से 2024-25 के बीच घरेलू देनदारियां (Household liabilities) 102% बढ़ गई हैं। घरेलू कर्ज़-से-जीडीपी (Household debt-to-GDP) का अनुपात 2015 में 26% था, जो अब बढ़कर 42% हो गया है। यह कर्ज़ ज्यादातर पर्सनल लोन (Personal loans), क्रेडिट कार्ड (Credit cards) और गोल्ड लोन (Gold loans) के रूप में है, जिसमें गोल्ड लोन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। बैंकों की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च से जून 2024 के बीच गोल्ड लोन से जुड़े एनपीए (NPAs) में 21% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है, जो बढ़ती वित्तीय तंगी का संकेत है।

पिछली नीतियों का असर

2016 में हुई नोटबंदी (Demonetisation) जैसी पिछली नीतियों का असर भी आज तक देखा जा सकता है। इन नीतियों ने छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) को काफी नुकसान पहुंचाया, जिससे कई नौकरियां गईं और ग्रामीण इलाकों में मंदी देखी गई। इस सबके बीच, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MNREGA) जैसे कार्यक्रमों पर निर्भरता बढ़ी है, जो ग्रामीण आय को कुछ सहारा देता है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल नौकरियों के सृजन का है, खासकर गैर-कृषि क्षेत्र में, जो बढ़ती कार्यबल की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है।

क्या है खतरे की घंटी?

देश की आर्थिक नींव मजबूत नहीं दिख रही है। लोग अपनी ज़रूरतें और ख्वाहिशें पूरी करने के लिए कर्ज़ पर ज्यादा निर्भर हो रहे हैं, जिससे उनकी संपत्ति कम हो रही है और दीर्घकालिक विकास प्रभावित हो रहा है। रोज़गार में जो वृद्धि हुई है, वह ज्यादातर कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों जैसे कृषि और निर्माण में है। चीन जैसे देशों के मुकाबले भारत की जीडीपी प्रति व्यक्ति (GDP per capita) अभी भी काफी कम है, और भले ही भारत का कुल कर्ज़-से-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP ratio) चीन से कम है, लेकिन यह तेजी से बढ़ रहा है, खासकर घरेलू स्तर पर। अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो कर्ज़ चुकाने का बोझ और बढ़ जाएगा, जिससे डिफ़ॉल्ट (Defaults) का खतरा भी पैदा हो सकता है।

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