भारत की प्रति व्यक्ति आय में बंपर ग्रोथ! RBI ने बताई जनसंख्या का 'कमाल'

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत की प्रति व्यक्ति आय में बंपर ग्रोथ! RBI ने बताई जनसंख्या का 'कमाल'
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता के अनुसार, भारत की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) में तेज बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इस शानदार ग्रोथ का मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि दर में आई भारी कमी है, जिसने इकोनॉमी को ग्लोबल लेवल पर मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है।

जनसंख्या वृद्धि का 'जादुई' असर

यह प्रति व्यक्ति आय में आई तेज उछाल, भारत के जनसांख्यिकीय (Demographic) बदलावों का सीधा नतीजा है। RBI डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने बताया कि भारत की जनसंख्या वृद्धि दर, दुनिया के औसत से कहीं ज्यादा तेजी से धीमी हुई है। इसका मुख्य कारण गिरती फर्टिलिटी रेट (fertility rates) और मृत्यु दर (death rate) का कम होना है, जो बढ़ती समृद्धि और बेहतर शिक्षा का प्रमाण है। इस जनसांख्यिकीय लाभांश (demographic dividend) का फायदा इकोनॉमी की लगातार बढ़ती रफ्तार से और भी बढ़ गया है।

कहां से कहां पहुंची प्रति व्यक्ति आय?

इस बदलाव का असर सीधा प्रति व्यक्ति आय पर दिख रहा है। जहां 1981 में भारत की प्रति व्यक्ति आय महज $274 थी, वहीं 2024 में यह बढ़कर लगभग $2700 हो गई है। यह लगभग दस गुना की वृद्धि है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की मानें तो यह ट्रेंड आगे भी जारी रहेगा। IMF का अनुमान है कि 2026 तक प्रति व्यक्ति आय $3051 और 2030 तक $4346 तक पहुंच सकती है। पिछली सदी में जहां आय दोगुनी होने में 23 साल लगते थे, वहीं पिछले 22 सालों में यह 5 गुना बढ़ गई है।

ग्लोबल मंच पर भारत की बढ़ती धाक

1990 के दशक की शुरुआत से ही भारत की इकोनॉमी दुनिया की रफ्तार से तेज रही है। इसी वजह से दुनिया की कुल इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी 1991 में जहां लगभग 1.1% थी, वह 2024 में बढ़कर 3.5% हो गई है। इससे दुनिया के औसत के मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति GDP का अंतर भी काफी कम हुआ है। 1991 में यह गैप करीब 7% था, जो 2024 तक करीब 20% तक पहुंच गया है। पिछले चार सालों में GDP ग्रोथ रेट बढ़कर 7.7% रही है, जो 1980 के दशक के 5.7% के औसत से काफी ज्यादा है।

मैक्रो इकोनॉमिक स्थिरता का सहारा

लगातार मजबूत आर्थिक विकास के साथ-साथ भारत ने मैक्रो इकोनॉमिक स्थिरता (macroeconomic stability) को भी बनाए रखा है। महंगाई (inflation), करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) और फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficit) जैसे महत्वपूर्ण इंडिकेटर्स संतोषजनक रेंज में रहे हैं। पिछले चार दशकों में इनमें काफी सुधार हुआ है। यह स्थिरता, भरोसेमंद सरकारी नीतियां और मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, भारत की लगातार बेहतर होती आर्थिक स्थिति को मजबूती दे रहे हैं।

आगे की राह और चुनौतियाँ

हालांकि, भारत का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी हैं। ग्लोबल इकोनॉमी में आ रहा बिखराव, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में बदलाव भारत की एक्सपोर्ट-बेस्ड ग्रोथ को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के बावजूद, आर्थिक सुधारों की रफ्तार को और तेज करने की जरूरत है ताकि इसका फायदा सभी तक पहुंचे। चीन जैसे देशों में भी जनसांख्यिकीय बदलाव आ रहे हैं, जबकि इंडोनेशिया जैसे देश ग्रोथ को महंगाई और कर्ज प्रबंधन के साथ साधने की कोशिश कर रहे हैं। ग्लोबल ब्याज दरों में बढ़ोतरी या लगातार महंगाई का दबाव भारत की फिस्कल पोजीशन पर असर डाल सकता है।

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