रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक हालिया रिपोर्ट ने भारत के पेमेंट सिस्टम के दोहरे स्वरूप को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश का फाइनेंसियल सिस्टम अब दो मुख्य हिस्सों में बंट गया है: एक तरफ यूपीआई (Unified Payments Interface) है जो रोजाना के छोटे-मोटे रिटेल पेमेंट्स की बाढ़ संभालता है, और दूसरी तरफ आरटीजीएस (Real-Time Gross Settlement) है जो देश के सबसे बड़े फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन्स को निपटाता है।
UPI की भारी मात्रा, RTGS की बड़ी वैल्यू
RBI की दिसंबर 2025 की पेमेंट सिस्टम रिपोर्ट बताती है कि यूपीआई, जो एक डिजिटल टूल है, 2025 की दूसरी छमाही में सभी पेमेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का एक बड़ा 85.5% था, लेकिन कुल वैल्यू में इसका योगदान केवल 9.5% रहा। इसके विपरीत, आरटीजीएस ने केवल 0.1% ट्रांजैक्शन वॉल्यूम को प्रोसेस किया, लेकिन कुल वैल्यू का एक जबरदस्त 68.6% हिस्सा संभाला। यह दिखाता है कि कैसे एक सिस्टम आम जनता के रोज़मर्रा के इस्तेमाल में टॉप पर है, जबकि दूसरा सिस्टम बड़ी रकम के बड़े लेन-देन के लिए रीढ़ की हड्डी बना हुआ है।
वित्तीय प्रवाह पर इस बंटवारे का असर
यूपीआई की विशाल मात्रा इसके फाइनेंशियल इन्क्लूजन (Financial Inclusion) और रोज़मर्रा की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा देने में सफलता को दर्शाती है। 2021 से 2025 तक इसकी एनुअलाइज्ड ग्रोथ रेट वॉल्यूम के हिसाब से 55.8% रही, जबकि वैल्यू के हिसाब से 43% सीएजीआर (CAGR) दर्ज किया गया। डिजिटल पेमेंट्स अब ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 99.8% और वैल्यू का 97.8% बन गए हैं, जो भारत के तेज डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन का सबूत है। हालांकि, यूपीआई के लाखों छोटे ट्रांजैक्शन्स के मॉडल से इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अलग तरह का दबाव पड़ता है, जबकि आरटीजीएस का सिस्टम कम, लेकिन बड़े लेन-देन के लिए बना है। आरटीजीएस सिस्टम अपनी विश्वसनीयता और फाइनल सेटलमेंट के लिए जाने जाते हैं।
पेमेंट क्रांति का ऐतिहासिक सफर
पेमेंट सिस्टम का यह बंटवारा ऐतिहासिक जड़ों से जुड़ा है। 1870 के दशक के शुरुआती ईएफटी (EFTs) से लेकर 20वीं सदी के मध्य के क्रेडिट कार्ड और 1990 के दशक के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स तक, टेक्नोलॉजी ने हमेशा नए ट्रांजैक्शन टाइप्स को सक्षम बनाया है और स्पेशलाइजेशन को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के लिए, क्रेडिट कार्ड ने सुविधा देकर रिटेल पेमेंट्स में क्रांति ला दी, जिससे उपभोक्ता की आदतें बदलीं और बैंकों को सेटलमेंट सिस्टम विकसित करने पड़े। इसी तरह, डेबिट कार्ड में गिरावट, जिसमें वॉल्यूम -24.4% सीएजीआर से गिरे हैं, यह दिखाता है कि कैसे यूपीआई जैसे नए, अधिक कुशल सिस्टम पुराने सिस्टम को तेजी से बदल सकते हैं।
स्ट्रक्चरल कमजोरी: एक चिंता का विषय
जहां यूपीआई की प्रमुखता और आरटीजीएस की मजबूती एक आधुनिक वित्तीय प्रणाली को दर्शाती है, वहीं कुछ संभावित कमजोरियों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यूपीआई और आरटीजीएस के बीच ट्रांजैक्शन वैल्यू में भारी अंतर का मतलब है कि छोटे रिटेल फ्रॉड (Fraud) भी बड़ी मात्रा में होने वाले ट्रांजैक्शन्स के कारण बड़ी हानियों में बदल सकते हैं। इसके अलावा, यूपीआई का ध्यान कम वैल्यू वाले, कम-प्रॉफिट वाले ट्रांजैक्शन्स पर बैंकों और पेमेंट प्रोवाइडर्स पर दबाव डाल सकता है। आरबीआई की रिपोर्ट डेबिट कार्ड के इस्तेमाल में भी बड़ी गिरावट बताती है, जो एक मुख्य रिटेल पेमेंट मेथड पर ओवर-रिलायंस (Over-reliance) का संकेत देता है, जो किसी बड़े डिस्टर्प्शन (Disruption) की स्थिति में जोखिम भरा हो सकता है। वैश्विक स्तर पर, आरटीजीएस सिस्टम स्थिरता के लिए बनाए गए हैं, लेकिन फाइनेंशियल मार्केट्स के बढ़ते इंटरकनेक्शन (Interconnection) के कारण कोई भी अनपेक्षित शॉक (Shock) तेजी से फैल सकता है। भारत में फिनटेक (Fintech) इनोवेशन, जैसे कि 2023 में 46% बढ़े डिजिटल फ्रॉड के मामलों को संभालना, सभी प्रकार के ट्रांजैक्शन्स की सुरक्षा के लिए मजबूत सिक्योरिटी की निरंतर आवश्यकता को उजागर करता है।
भविष्य का नज़रिया: विभाजन को जोड़ना
भारत के पेमेंट सिस्टम का भविष्य हाई-वॉल्यूम रिटेल पेमेंट्स और हाई-वैल्यू बिजनेस ट्रांजैक्शन्स की जरूरतों को संतुलित करने पर निर्भर करता है। अनुमानों के अनुसार, डिजिटल पेमेंट्स का ग्रोथ 2026 तक $1 ट्रिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। जबकि यूपीआई के FY28 तक 1 बिलियन ट्रांजैक्शन्स प्रतिदिन संभालने का अनुमान है, सैचुरेशन (Saturation) के संकेत नई उपयोगिताओं और सिस्टम अपग्रेड की आवश्यकता को बताते हैं। यूपीआई से जुड़ने वाले क्रेडिट कार्ड, पेमेंट सिक्योरिटी और पर्सनलाइजेशन (Personalization) में एआई (AI) एडवां.मेंट के साथ ग्रोथ के बड़े ड्राइवर बनने की उम्मीद है। भारत की प्रोजेक्ट नेक्सस (Project Nexus) जैसी पहलों के माध्यम से क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स (Cross-border Payments) को बेहतर बनाने के प्रयास भी चल रहे हैं। अंततः, भारत की सफलता यूपीआई के समावेशी विकास को बनाए रखने के साथ-साथ अपने हाई-वैल्यू सेटलमेंट सिस्टम को सुरक्षित रखने पर निर्भर करेगी। इसके लिए निरंतर रेगुलेटरी ध्यान और नई टेक्नोलॉजी की आवश्यकता है।