Passive Investing का बूम: India में AUM ₹15 लाख करोड़ के पार, Active Funds पर बढ़ा दबाव!

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
Passive Investing का बूम: India में AUM ₹15 लाख करोड़ के पार, Active Funds पर बढ़ा दबाव!
Overview

भारत में पैसिव इन्वेस्टिंग (Passive Investing) का जलवा जारी है। इस सेगमेंट में एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) **₹14-15 लाख करोड़** के आंकड़े को छूने वाला है, जो कुल म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का **18%** हिस्सा है। यह **2018** के मुकाबले करीब **18 गुना** की जबरदस्त छलांग है।

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'पैसिव' की बढ़ती ताकत

भारतीय निवेश बाज़ार ने एक बड़ा बदलाव देखा है। पहले जो पैसिव फंड्स (Passive Funds) एक खास जगह रखते थे, अब पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बन गए हैं। लेटेस्ट अनुमानों के मुताबिक, 2025 के अंत तक पैसिव फंड्स का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹14-15 लाख करोड़ तक पहुँच जाएगा। यह 2018 के ₹1 लाख करोड़ से 18 गुना ज़्यादा है। अब ये फंड्स भारत के कुल म्यूचुअल फंड AUM (जो ₹80-81 लाख करोड़ के करीब है) का लगभग 18% हिस्सा रखते हैं। यह ट्रेंड ग्लोबल मार्केट की चाल के साथ चल रहा है, जहाँ डेवलप मार्केट्स में भी पैसिव स्ट्रेटेजीज़ ने एक्टिव मैनेजमेंट को पीछे छोड़ा है।

इंडेक्स से आगे, नई रणनीतियों की ओर

पैसिव इन्वेस्टिंग का विकास सिर्फ NIFTY 50 या BSE SENSEX जैसे बड़े मार्केट इंडेक्स को ट्रैक करने तक ही सीमित नहीं है। निवेशकों का इंटरेस्ट अब काफी बढ़ गया है। अलग-अलग सेक्टर्स, मोमेंटम, क्वालिटी और लो-वोलेटिलिटी जैसे फैक्टर्स पर आधारित स्ट्रेटेजीज़ और थीमैटिक इन्वेस्टमेंट्स में भी मांग बढ़ी है। गोल्ड और सिल्वर जैसे कमोडिटी ईटीएफ (Commodity ETFs) में भी भारी इनफ्लो देखा गया है, जिससे पैसिव इन्वेस्टिंग का दायरा शेयर बाज़ार से आगे बढ़ा है। यह दिखाता है कि निवेशक अब बाज़ार में सटीक एक्सपोजर और अपनी ज़रूरत के हिसाब से पोर्टफोलियो टूल्स ढूंढ रहे हैं।

एक्टिव फंड मैनेजर्स पर बढ़ा दबाव

पैसिव फंड्स के इस उभार का सीधा असर एक्टिव फंड मैनेजमेंट पर पड़ रहा है। एक्टिव इक्विटी फंड्स, खासकर लार्ज-कैप (Large-cap) कैटेगरी में, अपने बेंचमार्क इंडेक्स को मात देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, खासकर फीस काटने के बाद। 2025 के डेटा के अनुसार, करीब 65-66% एक्टिव लार्ज-कैप फंड्स अपने इंडेक्स से पीछे रह गए। एक्टिव फंड्स की ऊँची फीस (जो सालाना 1% से 2.5% तक हो सकती है) की तुलना में पैसिव फंड्स की कम फीस (0.05% से 0.5%) निवेशकों को लुभा रही है। ऐसे में एक्टिव फंड मैनेजर्स पर यह साबित करने का दबाव है कि वे अपनी वैल्यू कैसे देते हैं, हालाँकि मिड-कैप (Mid-cap), स्मॉल-कैप (Small-cap) या खास थीम्स में वे अब भी कुछ बढ़त दिखा सकते हैं।

पैसिव फंड्स के साथ जुड़े जोखिम

लेकिन, पैसिव स्ट्रेटेजीज़ में कुछ खास जोखिम भी हैं जिन पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए। मार्केट-कैप वेटेड इंडेक्स (Market-cap weighted indexes) में अक्सर बहुत ज़्यादा ओवरवैल्यूड (Overvalued) स्टॉक्स शामिल हो सकते हैं, खासकर बाज़ार के टॉप पर। ऐसे में गिरावट के दौरान नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। चूंकि पैसिव फंड्स तय नियमों का पालन करते हैं, उनमें फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility) की कमी होती है। इंडेक्स में बदलाव के दौरान उन्हें तब भी शेयर खरीदने या बेचने पड़ते हैं जब कीमत अच्छी न हो। इससे एसेट की वैल्यू गलत तरीके से तय हो सकती है। पैसिव फंड्स सीधे बाज़ार के उतार-चढ़ाव से जुड़े होते हैं; बाज़ार गिरने पर वे भी गिरते हैं, और बाज़ार के रिस्क के खिलाफ कोई बफर नहीं देते। इसके अलावा, इंडेक्स ट्रैकिंग एरर (Tracking errors) और कम ट्रेड होने वाले सिक्योरिटीज में लिक्विडिटी (Liquidity) का जोखिम भी बना रहता है। सबसे बड़ी सीमा यह है कि ये फंड बाज़ार के रिटर्न को ही मैच कर पाते हैं, अतिरिक्त रिटर्न (Alpha) नहीं दे पाते।

निवेशक और वितरक की बढ़ती स्वीकार्यता

लगभग 76% रिटेल इन्वेस्टर्स अब इंडेक्स फंड्स या ईटीएफ (ETFs) से परिचित हैं, जो जागरूकता में एक बड़ी छलांग दिखाता है। 2025 में लगभग 68% निवेशकों के पास कम से कम एक पैसिव फंड था। इसकी वजह कम लागत, डाइवर्सिफिकेशन (Diversification), सरलता और ट्रांसपेरेंसी (Transparency) है। वितरकों (Distributors) ने भी पैसिव स्ट्रेटेजीज़ को अपनाया है, कई इसे क्लाइंट पोर्टफोलियो में शामिल कर रहे हैं और भविष्य में इसका आवंटन बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस (Financial Independence) और रिटायरमेंट प्लानिंग (Retirement Planning) जैसे लॉन्ग-टर्म निवेश लक्ष्यों के लिए पैसिव फंड्स को एक मुख्य आधार माना जा रहा है।

पैसिव इन्वेस्टिंग का भविष्य

एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि भारत में पैसिव इन्वेस्टिंग का विकास जारी रहेगा। इसका कारण डिजिटलइज़ेशन (Digitalization), बेहतर वित्तीय समझ और लागत-प्रभावी, स्पष्ट निवेश विकल्पों की बढ़ती मांग है। हालाँकि मार्केट शेयर बढ़ने की उम्मीद है, फैक्टर (Factor) और थीमैटिक ईटीएफ (Thematic ETFs) जैसे अधिक जटिल पैसिव प्रोडक्ट्स का उदय, उन्नत पैसिव विकल्पों की ओर इशारा करता है। मुख्य चुनौती विभिन्न इंडेक्स मेथड्स (Index methods) के विशिष्ट जोखिमों को समझना और यह सुनिश्चित करना है कि पैसिव स्ट्रेटेजीज़ लॉन्ग-टर्म लक्ष्यों के साथ फिट बैठें।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.