भारतीय कंपनियों ने मई में विदेश में निवेश की योजनाएं 49% तक घटा दी हैं, जो कुल $4.49 बिलियन है। वहीं, दूसरी ओर, भारत ने FY26 में $94.53 बिलियन के रिकॉर्ड इनवर्ड FDI (Foreign Direct Investment) को आकर्षित किया है, जो देश की बढ़ती अहमियत दिखाता है।
क्या हुआ?
मई 2026 में, भारतीय कंपनियों ने विदेशों में निवेश की अपनी योजनाओं को काफी कम कर दिया है। आउटवर्ड फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (OFDI) यानी बाहर की ओर होने वाला निवेश घटकर $4.49 बिलियन रह गया। यह अप्रैल के $8.84 बिलियन की तुलना में 49.02% की भारी गिरावट है। ये आंकड़े बताते हैं कि घरेलू कंपनियां अब विदेश में विस्तार को लेकर थोड़ी धीमी पड़ गई हैं, खासकर इक्विटी निवेश और गारंटी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कमी देखी गई है।
विदेश में कंपनियों की रणनीति में बदलाव
आउटवर्ड निवेश में यह कमी मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में हुई: इक्विटी निवेश, गारंटी और लोन। विदेशी इक्विटी निवेश 64.7% गिरकर अप्रैल के $3.54 बिलियन से मई में $1.25 बिलियन पर आ गया। भारतीय कंपनियों द्वारा अपनी विदेशी इकाइयों के लिए जारी की गई गारंटी में भी करीब 35% की गिरावट आई और यह $2.61 बिलियन रही। वहीं, भारतीय पेरेंट कंपनियों द्वारा अपनी अंतरराष्ट्रीय सब्सिडियरी को दिए जाने वाले लोन भी पिछले महीने के $1.3 बिलियन की तुलना में घटकर $632.1 मिलियन रह गए। जिन कंपनियों ने उल्लेखनीय प्रतिबद्धताएं दिखाई थीं, उनमें Indovida India, Tata International, Arvind Advanced Materials, और ONGC Videsh Rovuma शामिल हैं।
रिकॉर्ड इनवर्ड FDI घरेलू भरोसे को दिखाता है
जहां एक ओर भारतीय कंपनियां विदेश में निवेश घटा रही हैं, वहीं विदेशी निवेशकों ने भारत में पैसा लगाना जारी रखा है। 2026 के फाइनेंशियल ईयर (FY26) में देश ने $94.53 बिलियन का इनवर्ड फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) हासिल किया है, जो एक रिकॉर्ड है। यह आंकड़ा बताता है कि वैश्विक निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता को लेकर काफी सकारात्मक हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस इक्विटी निवेश का 90% से अधिक ऑटोमैटिक रूट से आया है, जो भारत के मौजूदा रेगुलेटरी और कारोबारी माहौल पर उनके भरोसे को दर्शाता है। अगर पिछले लंबे समय को देखें, तो FY15 से FY26 के बीच कुल FDI इनफ्लो $843 बिलियन रहा, जो पिछले बारह सालों की तुलना में 169% की बढ़ोतरी है।
निवेशक इसे कैसे देखें?
निवेशकों के लिए, ये दोनों आंकड़े कैपिटल एलोकेशन की एक मिली-जुली कहानी कहते हैं। आउटवर्ड FDI में गिरावट का मतलब यह हो सकता है कि भारतीय कंपनियां फिलहाल कैपिटल को बचाकर रखने या घरेलू विकास पर ध्यान केंद्रित करने को प्राथमिकता दे रही हैं। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता या ऊंची ब्याज दरों के दौर में, कंपनियां अक्सर बड़े अंतरराष्ट्रीय दांव लगाने से पहले इंतजार करना पसंद करती हैं। वहीं, रिकॉर्ड इनवर्ड FDI यह दिखाता है कि भारत विदेशी पूंजी के लिए एक पसंदीदा जगह बना हुआ है, जो देश के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स को संतुलित करने और स्थानीय मुद्रा को मजबूती देने में मदद करता है।
आगे क्या देखना है?
निवेशकों को इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि आउटवर्ड निवेश में यह गिरावट एक अस्थायी उतार-चढ़ाव है या एक लंबे ट्रेंड की शुरुआत। अगर कंपनियां घरेलू स्तर पर पूंजी बनाए रखती हैं, तो यह स्थानीय बाजार हिस्सेदारी और घरेलू पूंजीगत व्यय परियोजनाओं पर गहन फोकस की अवधि का संकेत दे सकता है। दूसरी ओर, रिकॉर्ड-तोड़ इनवर्ड FDI की निरंतरता भारत की स्थिर रेगुलेटरी व्यवस्था और प्रतिस्पर्धी विकास दर बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। घरेलू पूंजीगत खर्च और आने वाली OFDI की रिपोर्टें यह स्पष्ट करेंगी कि क्या यह घरेलू बाजार की ओर झुकाव बना रहता है या नहीं।
