भारत की तेल निर्भरता आधी हुई! GDP का सिर्फ 0.7% रह गया: निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorAditya Rao|Published at:
भारत की तेल निर्भरता आधी हुई! GDP का सिर्फ 0.7% रह गया: निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?

भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता में भारी कमी आई है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में तेल-GDP इंटेंसिटी घटकर **0.7%** रह गई है, जो 2014 में **1.4%** थी। इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की बढ़ती मांग, रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के विस्तार ने इस बदलाव को रफ्तार दी है। निवेशकों के लिए, यह एक बड़ा संकेत है कि हम तेल पर निर्भर सेक्टरों से हटकर ग्रीन मोबिलिटी और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर बढ़ रहे हैं।

क्या हुआ?

पिछले 12 सालों में भारत ने कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को काफी कम कर लिया है। SBI रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश की ऑयल इंटेंसिटी, जो GDP के प्रतिशत के रूप में मापी जाती है, फाइनेंशियल ईयर 2014 के 1.4% से घटकर फाइनेंशियल ईयर 2026 में 0.7% हो गई है।

इससे भी बड़ी बात यह है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 की दूसरी तिमाही में GDP के मुकाबले कच्चे तेल का आयात 3.1% पर आ गया, जो 2014 की समान अवधि में 8.6% था। यह सब तब हुआ है जब अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है, जो दर्शाता है कि आर्थिक विकास अब तेल की खपत पर उतना निर्भर नहीं रह गया है।

ग्रीन मोबिलिटी की ओर बड़ा कदम

तेल निर्भरता में यह कमी कई संरचनात्मक बदलावों का नतीजा है। डीजल सिंचाई पंपों से सौर ऊर्जा प्रणाली की ओर बढ़ना, शहरों में मेट्रो रेल नेटवर्क का विस्तार और रिन्यूएबल एनर्जी का बढ़ा हुआ उपयोग प्रमुख कारण हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), खासकर तीन-पहिया और इलेक्ट्रिक बसों की बढ़ती मांग ने भी ईंधन की खपत को कम करने में अहम भूमिका निभाई है।

EV एडॉप्शन: एक हकीकत

हालांकि यह बदलाव सकारात्मक है, लेकिन सभी वाहन श्रेणियों में यह एक समान नहीं है। SBI रिसर्च का कहना है कि इलेक्ट्रिक तीन-पहिया और बसों की मांग बढ़ रही है, लेकिन इलेक्ट्रिक पैसेंजर कारों और ट्रकों को अपनाने की रफ्तार अभी भी धीमी है। तुलना के लिए, चीन में 2025 तक इलेक्ट्रिक ट्रकों की बिक्री में एक-चौथाई हिस्सेदारी है, जबकि भारत अभी शुरुआती दौर में है। सरकार की PM E-DRIVE स्कीम इस अंतर को पाटने के लिए इंसेंटिव देने का लक्ष्य रखती है, लेकिन एडॉप्शन की रफ्तार इस बात पर निर्भर करेगी कि लागत कितनी जल्दी कम होती है और इंफ्रास्ट्रक्चर कितना बेहतर होता है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और एग्जीक्यूशन का जोखिम

निवेशकों के लिए, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। भारत ने 29,000 से अधिक पब्लिक चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए हैं, लेकिन इनमें से केवल 30% ही फास्ट चार्जर हैं। प्रमुख रास्तों पर फास्ट चार्जिंग सुविधाओं की कमी इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों और कमर्शियल ट्रकों के एडॉप्शन को धीमा कर सकती है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि सड़क पर बढ़ते EVs की संख्या के साथ चार्जिंग पॉइंट का विस्तार कितनी तेजी से होता है। कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्य चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में आगे हैं, लेकिन देश भर में कवरेज अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

तेल पर अधिक निर्भरता से हटने के इस कदम के एनर्जी और ऑटो सेक्टर पर लंबे समय तक असर होंगे। यदि 2030 तक सभी पंजीकृत वाहनों में EV का हिस्सा 20% तक पहुंच जाता है, तो तेल आयात बिल में संभावित बचत ₹1 लाख करोड़ तक हो सकती है। निवेशकों को PM E-DRIVE स्कीम की प्रभावशीलता, फास्ट-चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की तैनाती की गति और क्या सरकार ग्रीन मोबिलिटी के लिए फाइनेंसिंग लागत को कम करने हेतु EV क्रेडिट गारंटी फंड जैसे और उपाय लाती है, इन पर नजर रखनी चाहिए।

Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.