तेल का संकट: भारत पर 'महंगाई का टैक्स' और कमजोर रुपया
Middle East में चल रहा भू-राजनीतिक संकट भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स पर मंडरा रहे खतरे के कारण भारत की 89% तक तेल आयात पर निर्भरता अर्थव्यवस्था को मुश्किल में डाल सकती है। अमेरिका के दबाव के चलते भारत को ऊर्जा आयात में और ज़्यादा लागत देनी पड़ रही है, जिसे 'Appeasement Tax' भी कहा जा रहा है।
दुश्मन देश को छूट, भारत को महंगा सौदा?
जहां एक तरफ चीन ईरान से सस्ते तेल की खरीद जारी रखे हुए है और प्रतिबंधों वाले तेल को भी संसाधित करने वाले प्लांट्स का इस्तेमाल कर रहा है, वहीं भारत को महंगा सौदा भुगतना पड़ रहा है। भारत अब अटलांटिक बेसिन जैसे दूर के स्रोतों से तेल मंगा रहा है, जिसमें शिपिंग और बीमा का खर्च ज़्यादा आ रहा है। रूस का Urals क्रूड भी अब भारत के लिए प्रीमियम पर बिक रहा है। 16 मार्च, 2026 को यह $98.93 प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि रूसी पोर्ट्स पर इसकी कीमत $73.73/bbl थी। यह फरवरी के डिस्काउंट रेट्स से काफी अलग है।
महंगाई का डर और गिरता रुपया
इस बढ़ती लागत का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। Goldman Sachs ने 2026 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का अनुमान 4.2% से बढ़ाकर 4.6% कर दिया है, क्योंकि तेल की कीमतें $108/bbl के पार जा सकती हैं। इसके अलावा, Middle East से आने वाले रेमिटेंस (पैसे) पर भी असर पड़ रहा है। परिवहन और लॉजिस्टिक्स की बढ़ी लागत महंगाई को और भड़काएगी। Bernstein का अनुमान है कि रुपया 98 प्रति डॉलर तक जा सकता है, जबकि BofA Global Research ने जून 2026 के लिए अपना अनुमान 89 से घटाकर 94 कर दिया है।
जानकारों की चेतावनी और RBI की मुश्किल
Moody's Ratings की मानें तो, यह संकट भारत के आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है। रेटिंग एजेंसी ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाले संकट से रुपया कमजोर हो सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और चालू खाता घाटा (CAD) भी बढ़ सकता है, जो FY25 के लिए करीब 3.5% के आसपास है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि 2026 तक ब्याज दरें ऊंची रह सकती हैं। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने पहले ही ₹1 ट्रिलियन से ज़्यादा की निकासी कर ली है।
ऊर्जा सुरक्षा की राह में बड़ी बाधा
भारत की ऊर्जा सुरक्षा का रास्ता मुश्किल बना हुआ है। सरकार फिलहाल तत्काल आपूर्ति पर ध्यान केंद्रित कर रही है, लेकिन लंबे समय के लिए एक मजबूत रणनीति बनाने की ज़रूरत है। 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए, भारत को ऐसे समय में Pragmatic एनर्जी डील्स पर विचार करना होगा, जहां आर्थिक स्थिरता बनी रहे।