प्राइवेट सेक्टर पर फोकस, सरकार बनेगी सूत्रधार
भारत सरकार के दृष्टिकोण में एक बदलाव के संकेत के तौर पर, एक नई राष्ट्रीय रोजगार नीति का मसौदा जल्द ही पेश किया जाएगा। केंद्रीय श्रम मंत्री मंसूख मांडविया ने बताया कि यह नीति अपने अंतिम चरण में है और जल्द ही फीडबैक के लिए साझा की जाएगी। इसका मुख्य उद्देश्य प्राइवेट सेक्टर को रोजगार बढ़ाने का जिम्मा सौंपना है। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं, जैसे एम्प्लॉयमेंट-लिंक्ड इंसेंटिव प्रोग्राम (employment-linked incentive program), का इस्तेमाल उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार अब सीधी भूमिका निभाने के बजाय एक सूत्रधार (facilitator) के तौर पर काम करेगी।
कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स की चिंताएं और अंतर्राष्ट्रीय अवसर
नीति सिर्फ बड़े लक्ष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार कुछ खास लेबर मार्केट के क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। मांडविया ने कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स के सामने आने वाली चुनौतियों, खासकर समय पर वेतन भुगतान न होने के मुद्दे पर चिंता जताई। उन्होंने उद्योगों से लेबर कानूनों का पालन सुनिश्चित करने को कहा। कॉन्ट्रैक्ट एजेंसियों द्वारा देरी से सैलरी देने के कारण श्रमिकों को काफी परेशानी हो रही है। इसके अलावा, मंत्री ने कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) जैसे उद्योग समूहों को भारतीय श्रमिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोजगार के अवसरों का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस कदम का उद्देश्य भारतीय श्रमिकों को विदेश में नौकरी पाने में आसानी प्रदान करना है, ताकि वे ग्लोबल डिमांड (global demand) और स्किल लेवल (skill level) के अनुसार अवसरों का लाभ उठा सकें।
आर्थिक चुनौतियाँ: भू-राजनीति और विकास पर असर
यह नई रोजगार नीति ऐसे समय में आ रही है जब देश गंभीर आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना कर रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष (West Asia conflict) एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल को पार कर गईं, तो 2026 तक भारत की GDP ग्रोथ 6.5% से भी नीचे गिर सकती है। हाल ही में मूडीज रेटिंग्स (Moody's Ratings) ने 2026 के लिए भारत की ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6% कर दिया है। लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतों के कारण 2026 में महंगाई (inflation) के 4.5% पर बने रहने का भी जोखिम है। इस संघर्ष का भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) पर असर पड़ रहा है और रुपया भी कमजोर हुआ है। विदेशी निवेशक (Foreign investors) सतर्क हो रहे हैं, जिसके चलते देश से काफी पूंजी बाहर निकल रही है। बैंकर उदय कोटक का कहना है कि भारतीय परिवारों ने अभी तक ऊंची तेल कीमतों का पूरा असर महसूस नहीं किया है, और माना जा रहा है कि मौजूदा ईंधन भंडार (fuel stocks) तत्काल प्रभाव को कुछ हद तक कम कर रहे हैं।
लेबर रिफॉर्म्स और इंडस्ट्री का इनपुट
यह रोजगार नीति की घोषणा बड़े लेबर रिफॉर्म्स (labor reforms) के बाद हुई है। भारत ने 2025 के आखिर में 29 लेबर कानूनों को मिलाकर चार मुख्य कोड बनाए थे: कोड ऑन वेजेस (Code on Wages), कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी (Code on Social Security), इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड (Industrial Relations Code) और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ, एंड वर्किंग कंडीशंस कोड (Occupational Safety, Health, and Working Conditions Code)। इन सुधारों का मकसद 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (ease of doing business) को बेहतर बनाना और गिग (gig) और प्लेटफॉर्म वर्कर्स (platform workers) सहित सभी श्रमिकों के लिए सोशल सिक्योरिटी (social security) प्रदान करना है। हालांकि, वैश्विक रुझानों (global trends) को देखते हुए, ऐसी चिंताएं हैं कि इससे इनफॉर्मल वर्क (informal work) और कॉन्ट्रैक्ट की अस्थिरता (contract instability) बढ़ सकती है। CII ने रोजगार और उत्पादकता (productivity) बढ़ाने के लिए एक एकीकृत रोजगार नीति और लेबर कोड्स के बेहतर कार्यान्वयन की मांग की है।
कार्यान्वयन की चुनौतियाँ और आगे की राह
हालांकि नई रोजगार नीति का लक्ष्य जॉब ग्रोथ को बढ़ावा देना है, लेकिन कई अंदरूनी मुद्दे और संभावित कार्यान्वयन की समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। एम्प्लॉयमेंट इंसेंटिव प्रोग्राम (employment incentive program) में कम रजिस्ट्रेशन (registration) यह दर्शाता है कि केवल इंडस्ट्री इंसेंटिव (industry incentives) हायरिंग (hiring) को नहीं बढ़ा सकते, बल्कि बिज़नेस कॉन्फिडेंस (business confidence) या डिमांड (demand) जैसी गहरी समस्याओं की ओर इशारा करते हैं। कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स, जो वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 94%) हैं, आज भी कम वेतन, नौकरी की असुरक्षा (job insecurity), खराब कामकाजी माहौल और शोषण (exploitation) जैसी व्यापक समस्याओं का सामना कर रहे हैं, भले ही मौजूदा कानून लागू हैं। प्राइवेट सेक्टर के नेतृत्व पर सरकार का जोर, कंपनियों की हायरिंग की इच्छा और क्षमता पर काफी हद तक निर्भर करेगा - एक ऐसी प्रतिबद्धता जो वैश्विक अस्थिरता और बढ़ती लागतों से प्रभावित हो सकती है, खासकर उन छोटी और मध्यम व्यवसायों (MSMEs) के लिए जो रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण हैं। विश्लेषकों (Analysts) का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ 6% से 7.8% के बीच रहेगी, जो वैश्विक आर्थिक स्थितियों और भू-राजनीतिक स्थिरता (geopolitical stability) पर निर्भर करेगा। नई रोजगार नीति की सफलता, प्राइवेट निवेश (private investment) और जॉब ग्रोथ के लिए एक अनुकूल माहौल बनाने के साथ-साथ, कमजोर कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स के लिए लेबर प्रोटेक्शन (labor protections) को सख्ती से लागू करने पर निर्भर करेगी। उत्पादकता (productivity), स्किल्स मैचिंग (skills matching) और बाहरी झटकों (external shocks) से निपटने जैसे मुद्दों को हल करना भारत की जनसांख्यिकीय क्षमता (demographic potential) को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
