यह सर्वे आर्थिक नीति-निर्माण (economic policymaking) के लिए बहुत अहम जानकारी देगा। 4.5 लाख घरों को कवर करने का लक्ष्य रखा गया है ताकि महत्वपूर्ण डेटा गैप्स को भरा जा सके। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) इस सर्वे को अप्रैल 2026 से मार्च 2027 तक करेगा। यह सर्वे सीधे आय स्तर (income level) का अनुमान देगा, जो पिछले उपभोग (consumption) और रोजगार सर्वे से अलग है। यह डेटा राष्ट्रीय खातों (national accounts) को मजबूत करने और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index - CPI) को रीबेस करने में मदद करेगा। IMF के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुरजीत भल्ला की अगुआई वाले एक एक्सपर्ट ग्रुप ने इसे अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं (international best practices) के आधार पर तैयार किया है। इसमें वेतन (wages), स्वरोजगार (self-employment), संपत्ति (property), पेंशन और रेमिटेंस से होने वाली आय को शामिल किया जाएगा।
इस सर्वे के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। पायलट टेस्ट में सामने आया कि करीब 95% लोग अपनी आय से जुड़े सवाल, खासकर टैक्स (tax) या वित्तीय संपत्ति (financial assets) की जानकारी देने में हिचकिचाते हैं। इसके अलावा, बड़े अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) में भी सही आंकड़े जुटाना एक टेढ़ी खीर है, क्योंकि वहां कई लोग टैक्स फाइल नहीं करते। विश्लेषकों का मानना है कि लोग सटीक नंबरों के बजाय अंदाज़े बता सकते हैं, जिससे नतीजों में गड़बड़ी आ सकती है। लोगों को सर्वे में शामिल होने के लिए राजी करना और देश भर के सभी घरों तक पहुंचना भी एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती है। 15 महीने के सर्वे टाइमलाइन का मतलब है कि डेटा विश्लेषण और नीतियों में इसके इस्तेमाल से पहले काफी देरी होगी, जिससे यह मौजूदा आर्थिक मुद्दों के लिए कम उपयोगी साबित हो सकता है।
यह NHIS भारत के सांख्यिकीय सिस्टम (statistical system) को अपडेट करने के बड़े प्रयासों का हिस्सा है। हाल ही में GDP, CPI और IIP जैसे आर्थिक संकेतकों (economic indicators) को भी रीबेस किया गया है। NHIS से मिलने वाली जानकारी इन मेट्रिक्स, खासकर CPI की सटीकता को और बढ़ाएगी। IMF ने भी भारत के राष्ट्रीय खातों और वित्तीय डेटा में डेटा क्वालिटी (data quality) की कमियों को उजागर किया है, जिसे 'C' ग्रेड दिया गया है। यह NHIS जैसे सर्वे की जरूरत को और पुख्ता करता है।
संभावना है कि NHIS को सफलतापूर्वक लागू न किया जा सके या यह उपयोगी साबित न हो। सबसे बड़ी चिंता डेटा की सटीकता को लेकर है, जो लोगों की झिझक और बड़े अनटैक्स्ड अनौपचारिक इकॉनमी के कारण पैदा हो रही है। यह झिझक आय को कम रिपोर्ट करने का कारण बन सकती है, जिससे गरीबी और असमानता (poverty and inequality) के विश्लेषण पर असर पड़ेगा। सर्वे की लंबी समयावधि (timeline) का मतलब है कि जब नतीजे आएंगे, तब तक वे वर्तमान आर्थिक स्थितियों को शायद ही दर्शाएं, जिससे गलत नीतियां बन सकती हैं। भारत में आय डेटा जुटाने में पहले भी दिक्कतें आई हैं, और पिछले प्रयासों में भी ऐसी ही समस्याएं आई हैं या उनके नतीजे खर्च के पैटर्न से मेल नहीं खाते थे।
NHIS डेटा-संचालित नीति-निर्माण (data-driven policymaking) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अगर यह सर्वे अपनी चुनौतियों से पार पा लेता है, तो यह आय वितरण (income distribution), जीवन स्तर (living standards) और खर्च की आदतों (spending habits) पर मूल्यवान जानकारी देगा। यह डेटा कल्याणकारी कार्यक्रमों (welfare programs) को बेहतर बनाने, आर्थिक सुधारों का आकलन करने और समावेशी विकास (inclusive growth) को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण होगा। इसकी सफलता NSO की डेटा क्वालिटी और समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने की क्षमता पर निर्भर करती है, ताकि नीति निर्माताओं को भारत के आर्थिक भविष्य के लिए विश्वसनीय जानकारी मिल सके।
