₹180 लाख करोड़ का निवेश गैप
NITI Aayog की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य तक पहुँचने और 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए कुल 22.7 ट्रिलियन डॉलर (करीब ₹180 लाख करोड़) का भारी निवेश करना होगा। इसमें से अकेले बिजली क्षेत्र में ही आधे से ज्यादा पैसा लगेगा। यह अनुमान भारत की वर्तमान क्लीन एनर्जी में हो रहे निवेश से कई गुना ज्यादा है। देश में ग्रीन इनवेस्टमेंट बढ़ रहा है, लेकिन फाइनेंशियल ईयर 2025 से 2030 के बीच सिर्फ 31 लाख करोड़ रुपये का अनुमान है, जो कुल जरूरत का एक छोटा सा हिस्सा है। देश में रिन्यूएबल एनर्जी के लिए कैपिटल की लागत विकसित देशों से 80% ज्यादा है, जो विदेशी FDI को आकर्षित करने में बड़ी रुकावट बन सकती है। ऐसे में, भारत को चीन और ब्राजील जैसे देशों के साथ ग्लोबल मार्केट में इनवेस्टमेंट के लिए कॉम्पिटिशन करना होगा, जिन्होंने 2024 में ग्लोबल क्लीन एनर्जी इनवेस्टमेंट का बड़ा हिस्सा खींचा।
महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई पर मंडराता खतरा
नेट ज़ीरो के लक्ष्य को पाने के लिए लिथियम, कोबाल्ट, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की सप्लाई बेहद जरूरी है। लेकिन, भारत इन खनिजों के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। दुनिया भर में इन खनिजों की प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है। भारत इस समस्या से निपटने के लिए ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील और यूरोपीय देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है, लेकिन नई खदानें खोलने और सप्लाई चेन को मजबूत करने में औसतन 18 साल तक का समय लग सकता है। लिथियम कार्बोनेट जैसे मिनरल्स की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जो प्रोजेक्ट की लागत को और बढ़ा रही हैं। सप्लाई चेन में कोई भी बड़ी गड़बड़ी सोलर पैनल, विंड टरबाइन और एनर्जी स्टोरेज सिस्टम जैसे क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के विकास को रोक सकती है, जो नेट ज़ीरो के लक्ष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार की चुनौतियां
पूंजी और खनिजों के अलावा, भारत के सामने कुछ और बड़ी चुनौतियां भी हैं। लाखों लोग फॉसिल फ्यूल से जुड़े उद्योगों में काम करते हैं, ऐसे में उनके लिए नए रोजगार और स्किल डेवलपमेंट की व्यवस्था करना एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती होगी। हालांकि, भारत की रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी तेजी से बढ़ रही है (अक्टूबर 2025 तक करीब 200 GW पहुँचने का अनुमान है), लेकिन 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल कैपेसिटी का लक्ष्य हासिल करने के लिए मौजूदा गति को दोगुना करना होगा। इसके अलावा, बिजली के ग्रिड को मजबूत करने और ट्रांसमिशन लाइनों के विस्तार में 2030 तक 150 बिलियन डॉलर तक का निवेश करना पड़ सकता है। कुछ रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स में देरी भी देखी गई है, जिससे इंडस्ट्री में कुछ चिंताएं बढ़ी हैं। Adani Green Energy (मार्केट कैप 15.43 बिलियन डॉलर) और NHPC (मार्केट कैप 8.67 बिलियन डॉलर) जैसी कंपनियां इस सेक्टर में आगे हैं, लेकिन कई छोटी कंपनियों को भारी लिवरेज और एग्जीक्यूशन रिस्क का सामना करना पड़ता है।
निर्भरता के बीच विकास की नई राह
नेट ज़ीरो की राह भारत के लिए सिर्फ पर्यावरण की लड़ाई नहीं, बल्कि विकास के मॉडल को फिर से परिभाषित करने का मौका है। लेकिन, इसकी सफलता विदेशी कैपिटल को आकर्षित करने, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने और मजबूत घरेलू फाइनेंशियल और गवर्नेंस सुधारों पर टिकी है। अगर भारत इन चुनौतियों का सामना करने में सफल रहा, तो यह एक रेजिलिएंट, लो-कार्बन इकोनॉमिक फ्यूचर की ओर बढ़ सकता है, वरना यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य विकास में बाधा बन सकता है। इस दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर, फाइनेंस और जॉब ट्रांजिशन को लेकर लिए जाने वाले फैसले ही इस क्लीनर ग्रोथ मॉडल की दिशा तय करेंगे।