संकट के कारण ठप हुआ व्यापार, 3.5 अरब डॉलर का नुकसान
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संकट के चलते भारत का मध्य पूर्व (Middle East) के साथ व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। मार्च 2024 में, इन देशों को होने वाले भारतीय निर्यात में 58% की बड़ी गिरावट आई है, जिससे लगभग 3.5 अरब डॉलर का भारी नुकसान हुआ है। पहले जहां मध्य पूर्व को हर महीने औसतन 6 अरब डॉलर का सामान भेजा जाता था, वहीं मार्च में यह घटकर सिर्फ 2.5 अरब डॉलर रह गया। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि यह दिक्कतें अप्रैल में भी जारी रहने की उम्मीद है। इंजीनियरिंग गुड्स, रत्न और आभूषण (Gems and Jewellery), इलेक्ट्रॉनिक्स, पेट्रोलियम उत्पाद और चावल जैसे प्रमुख सेक्टर्स पर इसका सीधा असर पड़ा है। वहीं, मध्य पूर्व से होने वाले आयात (Imports) में भी 51.64% की कमी आई है, जिससे भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) और बढ़ गया है।
ऊर्जा आयात पर निर्भरता बनी बड़ी कमजोरी
मध्य पूर्व के साथ व्यापार में आई इस गिरावट ने भारत की ऊर्जा आयात (Energy Import) पर भारी निर्भरता की कमजोरी को उजागर कर दिया है। भारत अपने कच्चे तेल (Crude Oil) का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील रास्तों से आयात करता है। ऐसे में, खाड़ी क्षेत्र (Gulf region) में कोई भी भू-राजनीतिक उथल-पुथल सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है। इस संकट की वजह से माल ढुलाई (Freight) और बीमा (Insurance) की लागत काफी बढ़ गई है, साथ ही शिपिंग शेड्यूल भी बाधित हुआ है। हॉर्मुज से बचने के लिए केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) जैसे लंबे रास्तों से शिपिंग करने में ज्यादा समय और पैसा लग रहा है। यह समस्या खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स के लिए ज्यादा परेशानी वाली है, क्योंकि भारत यूएई (UAE) को बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात करता है, जो खुद एक प्रमुख री-एक्सपोर्ट हब है।
नया रास्ता तलाश रही सरकार, बढ़ाएगी निर्यात विविधता
इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार और उद्योग जगत मिलकर काम कर रहे हैं। सरकार निर्यात को विविध (Diversify) बनाने पर जोर दे रही है और अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे नए बाजारों की तलाश कर रही है। इसका मकसद किसी एक बाजार पर निर्भरता कम करना और भू-राजनीतिक बदलावों के प्रति देश की अर्थव्यवस्था को अधिक लचीला बनाना है। कुल मिलाकर, मार्च 2024 में भारत का मर्चेंडाइज निर्यात 38.92 अरब डॉलर रहा, जो FY26 के लिए एक रिकॉर्ड है। हालांकि, पिछले साल की तुलना में इसमें 7.44% की गिरावट देखी गई। पूरे फाइनेंशियल ईयर 2025-26 (FY26) की बात करें तो, मर्चेंडाइज निर्यात 1% बढ़कर 441.78 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 774.98 अरब डॉलर पर पहुंचा। सेवाओं (Services) के निर्यात ने अच्छी बढ़त बनाए रखी और FY26 में यह 418.31 अरब डॉलर रहने का अनुमान है।
महंगाई और रुपये पर दबाव का खतरा
पश्चिम एशिया संकट ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि मध्य पूर्व से ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता महंगाई (Inflation) को बढ़ावा दे सकती है और भारतीय रुपये (Rupee) पर दबाव बना सकती है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे शिपिंग मार्गों में रुकावटें आयात लागत बढ़ाती हैं, जिससे घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ सकती है और रुपये का मूल्य घट सकता है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) जैसे कच्चे तेल की कीमतें 108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चल रही हैं, जो सीधे तौर पर भारत के व्यापार घाटे को बढ़ा रहा है। शुरुआती मार्च में कच्चे तेल के आयात में भारी गिरावट आई थी क्योंकि प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं (Suppliers) से लोडिंग गंभीर रूप से बाधित हुई थी। रत्न और आभूषण निर्यात, जो भारत का एक प्रमुख निर्याती क्षेत्र है, मार्च में लॉजिस्टिक्स समस्याओं और बढ़ी हुई बीमा लागत के कारण 35.23% गिर गया। इसी तरह, बासमती चावल निर्यात, जिसका लगभग 80% मध्य पूर्व में जाता है, गंभीर रूप से बाधित है। लाखों टन चावल फंसे हुए हैं और युद्ध के कारण बढ़े सरचार्ज (War Surcharge) मुनाफे को कम कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रौद्योगिकी संघ (Electronics and Technology Association) का अनुमान है कि खाड़ी क्षेत्र में 4.5 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात पर खतरा मंडरा रहा है। यदि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) जल्द स्थिर नहीं हुई तो क्षेत्र में जारी अस्थिरता लगातार महंगाई और बढ़ते चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) का कारण बन सकती है।